तिरुवनंतपुरम: “केरल बौद्धिक चर्चा, सांस्कृतिक ज्ञान और आध्यात्मिक खोज का उद्गम स्थल रहा है. यह वह भूमि है जिसने आदि शंकराचार्य जैसे महापुरुषों को जन्म दिया जिन्होंने अद्वैत वेदांत के दर्शन की व्याख्या की और नारायण गुरु ने अपने सामाजिक सुधार और समाज सुधारकों की अपनी टीम के माध्यम से आधुनिक संदेश का नेतृत्व किया. हम उनमें से एक की स्मृति का जश्न मना रहे हैं.” उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तिरुवनंतपुरम में भारतीय विचार केन्द्रम द्वारा आयोजित चौथे पी परमेश्वरन व्याख्यान में यह बात कही. उन्होंने कहा कि यह भूमि कुछ सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों का भी घर है, जिनमें सबरीमाला, पद्मनाभस्वामी मंदिर और गुरुवायुर शामिल हैं, जो लाखों भक्तों को आकर्षित करते हैं, वे प्रेरित और उत्साहित होते हैं. इन पवित्र स्थानों में व्याप्त आस्था और भक्ति हमें उन शाश्वत मूल्यों की याद दिलाती है जो हमारे देश को एकजुट रखते हैं. उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारे मूल्य उत्कृष्ट महान हैं, धार्मिकता और आध्यात्मिकता, सदाचार और सेवा से परिपूर्ण हैं. इसी उपजाऊ पवित्र भूगोल ने  पी परमेश्वरन को भी जन्म दिया, जिन्होंने जन्म के साथ ही अपने मूल्य प्राप्त कर लिए. भारतीय मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता, भारतीय लोकाचार की उनकी गहरी समझ और राष्ट्रीय एकता के लिए उनका अथक प्रयास पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा. उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक आत्मनिर्भर भारत, सांस्कृतिक रूप से निहित और आध्यात्मिक रूप से जागृत भारत के लिए उनका दृष्टिकोण पूरे देश में गहराई से गूंजता है. जब हम पूर्व और पश्चिम के संगम के बारे में बात करते हैं, तो हमें विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद और शिकागो में उनके ऐतिहासिक भाषण की याद आती है, जो उन्होंने 1893 में विश्व धर्म परिषद में दिया था. लेकिन इसे फिर से किसने सुलगाया? हमारे अंदर की लौ किसने जलाई? आधुनिक समय में हमें किसने प्रेरित किया? उस भाषण के सार से जिसने वैश्विक मन को झकझोर दिया, वह कोई और नहीं बल्कि पी परमेश्वरन थे.

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि उस घटना के सौ साल बाद, 1993 में परमेश्वरन ने ही दुनिया को स्वामीजी के बारे में सोचने के लिए आमंत्रित किया. उनका जीवन, उनकी विरासत और उनका संदेश. भारत सरकार ने इस महान धरतीपुत्र, हिंदू विचार प्रक्रिया के एक महान विचारक को सही मायने में मान्यता दी है. उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारे पास एक ऐसा संविधान है जो गुरुकुल को उल्लेखनीय रूप से दर्शाता है. वह रामायण का संदर्भ देता है. संदेश क्या है? अधर्म पर धर्म की विजय, जबकि मौलिक अधिकार, संविधान के भाग- तीन में, आपके पास राम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या आने की तस्वीर है. अंधकार से प्रकाश, धर्म की जीत अधर्म की हार. मर्यादित आचरण का संदेश और यदि अगर कहें सबका साथ सबका विश्वास इसका अंश आपको रामायण में मिलेगा. उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के संविधान में, यदि हम अगले भाग, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों पर जाते हैं. महाभारत का वह दृश्य है, कुरुक्षेत्र का वह दृश्य है. श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं. यह हमें क्या सिखाता है? इसमें कहा गया है, लक्ष्य को ध्यान में रखो, छत को मत देखो, मछली को मत देखो, मछली की आंख को मत देखो क्योंकि आपका लक्ष्य नहीं है. आपको भेद करना है. इसी तरीके से शासन का काम करते हुए, कर्तव्य निर्वहन करते हुए हमारी दृष्टि भाई-भतीजावाद पर नहीं होनी चाहिए. संदेश जोरदार और स्पष्ट है. संरक्षणवाद, भाई-भतीजावाद, पक्षपात, ऐसी बुराइयां हैं जो समाज की योग्यता में कटौती करती हैं. सौभाग्यवश, सत्ता के गलियारों को साफ कर दिया गया है. प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक भारतीय का दायित्व है कि वह इन मूल्यों पर न केवल विश्वास करे, बल्कि उनका प्रसार भी करे.