नई दिल्ली: भारत को देखने का पूरी दुनिया का नजरिया बदला है. साहित्य जगत की यह जिम्मेदारी है कि वह इस बदलाव को दर्ज करे. आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि पचास साल बाद आने वाली पीढ़ी आपको किस रूप में याद करेगी. संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित ‘साहित्योत्सव’ का उद्घाटन करते हुए यह बात कही. उन्होंने इशारा किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई में पिछले ग्यारह वर्षों से जो बदलाव हो रहा है, उसे दुनिया देख, सुन रही है. उन्होंने कहा कि भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाला सबसे मजबूत तंतु साहित्य है. भारत के साहित्य की गतिशीलता और जीवंतता को उसकी विशेषता बताते हुए संस्कृति मंत्री ने कहा कि तकनीक के समय में अनुवाद के जरिए हमारा साहित्य अब वैश्विक होने लगा है. अब उस पर चर्चा प्रारंभ हो गई है. उन्होंने भारतीय साहित्य को जीवन को सही दिशा देने वाला मानते हुए कहा कि इसकी भूमिका हर काल और परिदृश्य में प्रासंगिक रही है और आगे भी रहेगी. यह भारत की मनीषा ही है जिसने अपनी पुरातनता को सदा नवीन बनाए रखते हुए यथार्थ से साक्षात्कार कर अनेक समस्याओं के निदान दिए हैं.
इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव अमृता प्रसाद साराभाई भी उपस्थित थीं. प्रारंभ में शेखावत ने रिबन काटकर और दीप प्रज्वलित कर साहित्य अकादेमी प्रदर्शनी 2024 का उद्घाटन किया. इस वार्षिक प्रदर्शनी में चित्रों तथा लेखों के विवरण से विगत वर्ष की उपलब्धियों को प्रदर्शित किया गया है.
साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने शाल, पुस्तक और पुष्प देकर शेखावत का स्वागत किया. अकादेमी सचिव ने पिछले वर्ष की उपलब्धियों के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि साहित्य अकादेमी ने पिछले वर्ष 484 किताबें और 459 कार्यक्रम आयोजित किए. साहित्योत्सव के पहले दिन 20 विभिन्न कार्यक्रमों में 100 से अधिक लेखकों ने सहभागिता की. कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम थे आदिवासी कविता एवं कहानी-पाठ और पैनल चर्चा. भारतीय साहित्य में नदियां, भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र की लोक संस्कृति, भारत की साहित्यिक कृतियों में लुप्त होता ग्रामीण समाज आदि विषयों पर भी विधिवत वक्तव्य दिए गए. अनेक सत्रों में बहुभाषी कविता और कहानी के पाठ किए गए. साहित्यप्रेमी श्रोताओं ने कहा कि सही मायनों में यह भारतीय भाषाओं का समग्र उत्सव है. साहित्योत्सव के प्रथम दिन गोदावरी सभागार में ‘भव्य पुष्पक्रम: आदिवासी कविता-पाठ’ का आयोजन हुआ. इस सत्र में टीएचडी चुङबोई चिरू- चिरू,नसीम अख़्तर -गोजरी, सम्प्री किमी फाङचो- कार्की, खानपो कोंचोक रिग्जेन- लद्दाखी, अनीता कोंवर -तिवा ने अपनी कविताओं का अपनी मूल भाषा में और उसके बाद उसका अर्थ बताते हुए हिंदी या अंग्रेजी में अनुवाद प्रस्तुत किया. अध्यक्षीय वक्तव्य में हरिराम मीणा ने आदिवासी कविता की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कई विशेष गुणों का उल्लेख किया. इन सभी कविताओं में प्रकृति, पशु और मानवीय संबंध आदि का सुंदर रूप देखने को मिला.