वाराणसीः जिस काशी ने कभी तुलसीदास और उनकी महान कृति 'रामचरित चरितमानस' को सहज ही मान्यता नहीं दी थी, वहां आज घर-घर में तुलसी किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं. इसको लेकर एक चर्चित कथा है, रामचरित मानस लिख लेने के बाद जब तुलसीदास उसपर मत लेने काशी आए तो यहां के विद्वानों ने श्रीरामचरितमानस को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि यह संस्कृत में नहीं है. गोस्वामी तुलसीदास निरंतर प्रयत्न करते रहे कि उनकी कृति को मान्यता मिल जाए. एक रोज काशी के विद्वत परिषद का संदेश गोस्वामी तुलसीदास को मिला. कहा गया कि तुलसी के ग्रंथ पर निर्णय अब बाबा विश्वनाथ ही करेंगे. एक रात तुलसीदास रचित श्री रामचरित मानस सबसे नीचे रख कर उसके ऊपर सभी धर्मग्रंथ रख दिए गए. अगली सुबह जब विद्वानों ने मंदिर के कपाट खोले तो देख कर दंग रह गए. श्रीरामचरितमानस न सिर्फ सबसे ऊपर थी अपितु उस पर सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् भी लिखा हुआ था.

 काशी हिंदू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में हिंदी की इस महान विभूति तुलसीदास की स्मृति में 'तुलसी जयंती सह कहानी पाठ' का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई. कुलगीत के पश्चात तुलसी भजन एवं काव्य पाठ हुआ, जिसको बी.ए.तृतीय वर्ष की छात्राओं ने प्रस्तुत किया. अतिथियों का स्वागत करते हुए प्राचार्या प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी ने इस बात की सविस्तार व्याख्या की कि तुलसीदास और उनका लोक कैसे एक-दूसरे में समाहित हैं. यही नहीं उन्होंने यह भी स्थापित किया कि भक्तिकाल और भक्तिकाव्य परंपरा में तुलसी और सूरदास किस तरह प्रासंगिक हैं. उन्होंने इस मौके पर उषा शर्मा की कहानियों पर भी अपनी बात रखीं.

 

डॉ. उषा शर्मा ने अपनी कहानी 'सूरज सहमा सा'' का पाठ किया. कहानी पाठ के बाद चर्चा सत्र में प्रो.ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि तुलसी जयंती पर काशी में बात करने का अपना महत्व है. तुलसीदास को दो रूपों में देखा जा सकता है साहित्यकार और भक्ति के प्रवर्तक के रूप में. रामचरितमानस के महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास की अन्य रचनाओं पर अपनी बात रखी और कहा कि एक कथानक के आधार पर छः महत्त्वपूर्ण और एक से बढ़ कर एक रचनाएं करना न केवल अनूठा और प्रासंगिक है, बल्कि उनकी अद्भुत प्रतिभा का भी परिचायक है. प्रोफेसर सिंह का कहना था कि तुलसीदास न केवल भक्ति रचना करते हैं, बल्कि भक्ति का मनोविज्ञान भी गढ़ते हैं.अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो.कुमुद प्रभा श्रीवास्तव ने कहा कि तुलसीदास आज भक्ति काव्यधारा के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवि हैं. उन्होंने उनकी रचनाओं पर प्रकाश डालते हुए उनकी लोकप्रियता को रेखांकित किया. कार्यक्रम का संचालन कुमारी सिंधु एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उर्वशी गहलोत ने किया.