नई दिल्लीः देश की भावनात्मक एकता को मजबूत बनाने में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभाजैसे संस्थानों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान स्वदेशी के साथ-साथ स्वभाषा पर भी बहुत ज़ोर दिया गया था. सुब्रह्मण्य भारती की देश प्रेम से भरी तमिल कविताओं की भावना पूरे देश में महसूस की जाती थी. हमारी भारतीय भाषाओं की जमीन और भाव-भूमि एक है. इसी एकता को मजबूत बनाने का काम हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को करना है. इसी सोच के साथ महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभाकी स्थापना की थी. बापू के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति भारत-रत्न, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने इस सभा के अध्यक्ष का पद संभाला था. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में स्थापित की गई इस संस्था द्वारा हिंदी सेवा के 100 वर्ष पूरा होने पर आयोजित शताब्दी समारोह का उद्घाटन राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द ने किया.  इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भाषाएं लोगों को जोड़ती हैं. भारतीय भाषाओं ने वसुधैव कुटुम्बकम्की भावना को संजोकर रखा है. भारत में अनेक भाषाएं और बोलियां हैं. उन सभी का अपना-अपना स्वरूप और सौन्दर्य है. यह विविधता, हमारी संस्कृति को उदार और समृद्ध बनाती है. इस संस्कृति को भाषा के विकास से जोड़ते हुए, हमारे संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी से जुड़े कुछ निर्देशों का उल्लेख किया गया है. उन निर्देशों के अनुसार, हिंदी भाषा का प्रचार इस ढंग से करना है कि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों को व्यक्त कर सके. साथ ही, यह निर्देश भी दिया गया है कि हिंदी, भारत की अन्य भाषाओं की विशेषताओं को आत्मसात करे.

 

हिंदी प्रचार के माध्यम से दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभाने राष्ट्रीय एकता और सौहार्द की नींव को मजबूत बनाया है. सभा ने लगभग 20 हज़ार सक्रिय हिंदी प्रचारकों का नेटवर्क विकसित किया है. सभा द्वारा अन्य भाषा-भाषियों के लिए हिंदी की परीक्षा आयोजित की जाती हैं. मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई है कि वर्ष 2017-18 के दौरान ऐसे परीक्षार्थियों की संख्या साढ़े आठ लाख से भी अधिक हो गयी है. इस सभा के प्रयासों से अब तक लगभग दो करोड़ छात्र लाभान्वित हो चुके हैं. सभा के स्नातकोत्तर और शोध संस्थानद्वारा लगभग 6 हजार व्यक्तियों को पी.एच.डी., डी-लिट और अन्य प्रमाण पत्र प्रदान किए जा चुके हैं. सभा द्वारा अनेक कॉलेजों के माध्यम से हिंदी शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है. सभा के राष्ट्रीय हिंदी शोध पुस्तकालयमें हिंदी साहित्य की एक लाख से भी अधिक पुस्तकें हैं. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभाने एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया है, जिसका अनुकरण देश के सभी क्षेत्रों में होना चाहिए. महात्मा गांधी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सन 1945 में वर्धा में दिए गए एक महत्वपूर्ण भाषण में महात्मा गांधी ने उत्तर भारत के लोगों से दक्षिण भारत की कम-से-कम एक भाषा सीखने का आग्रह किया था. भारतीय भाषाओं की उन्नति को वे अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में शामिल करते थे. उन्होंने स्वयं तमिल सीखने का उल्लेख अपनी आत्मकथा में किया है. यह अच्छा होगा कि सभी देशवासी अपने राज्य की मुख्य भाषा के अलावा, अन्य राज्यों की भाषाओं को सीखने में भी उत्साह दिखाएं. जब कोई हिंदी भाषी युवा, तमिल, तेलुगु, मलयालम या कन्नड़ भाषा सीखता है तो वह एक बहुत ही समृद्ध परंपरा से जुड़ जाता है. वह उस प्रदेश में अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकता है. यह जानकारी उसके व्यक्तित्व में एक नया पक्ष जोड़ने के साथ-साथ, उसके लिए विकास के नए अवसर भी पैदा कर सकती है. राष्ट्रपति ने दावा किया कि ऐसे अनेक वैज्ञानिक शोध सामने आ रहे हैं, जिनके अनुसार, एक से अधिक भाषा सीखने वाले व्यक्ति की मानसिक क्षमता में वृद्धि होती है. अधिक भाषाएं सीखने से सोच का दायरा भी बढ़ता है, दृष्टिकोण और अधिक व्यापक होता ह. भारत जैसे बहुभाषी देश में यह तथ्य और अधिक प्रासंगिक हो जाता है.