कटरा: “यह दीक्षांत का दिन है, यह शिक्षांत नहीं है. सीखना कभी बंद नहीं होता. आप सीखना बंद नहीं कर सकते, यह आपके साथ जीवन भर रहना चाहिए. सुकरात से पहले के एक दार्शनिक हेराक्लिटस की कही बात का संदर्भ दें तो जीवन में एकमात्र स्थिर चीज परिवर्तन है. उन्होंने एक उदाहरण देकर इसे पुष्ट किया कि एक ही व्यक्ति एक ही नदी में दो बार प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि न तो व्यक्ति वही है और न ही नदी वही है.” उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय जम्मू के 10वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही. छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आप और आपका वर्ग, युवा प्रतिभाओं का वर्ग, लड़के और लड़कियां, आप लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण हितधारक हैं, और आप भाग्यशाली हैं. यहां मैं रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा कही गई बात का उल्लेख करता हूं. रवींद्रनाथ टैगोर ने सोचा था और कल्पना की थी कि भारत को क्या करना चाहिए. ‘जहां मन भय मुक्त हो और सिर ऊंचा हो.’ हम बहुत लंबे समय से इस पारिस्थितिकी तंत्र से चूक गए थे. लेकिन अब, लड़के और लड़कियों, आप ऐसे समय में रह रहे हैं जहां आप बिना किसी डर के सोच सकते हैं क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था फल-फूल रही है भारत अभूतपूर्व आर्थिक उन्नति देख रहा है, और हम निश्चिंत हैं, क्योंकि देश की उन्नति को वैश्विक संस्थाओं द्वारा निवेश और अवसरों के पसंदीदा गंतव्य के रूप में सराहा जा रहा है. उपराष्ट्रपति ने कहा कि हम भारतीय हैं, भारतीयता हमारी पहचान है, राष्ट्रवाद हमारा धर्म है. हमारा परम कर्तव्य है कि हर हालत में हम राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें. राजनीतिक हो या व्यक्तिगत, कोई भी ऐसा हित नहीं है, जो राष्ट्रहित से बड़ा है. समस्या तब आती है, जब कई नवयुवक और कई नवयुवती कहती हैं कि हम क्या करें.
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि मैं इस विशेष दिन पर आप सभी से विशेष रूप से पांच बिंदुओं पर ध्यान केन्द्रित करने का आह्वान करूंगा. आप सभी लड़के और लड़कियां, यह कर सकते हैं, और आपको यह अवश्य करना चाहिए. पंच प्राण. ये पंच प्राण बहुत महत्वपूर्ण है. इनके अंदर है पारिवारिक मूल्य. परिवार के साथ जुड़ कर रहिए, माता पिता का सम्मान कीजिए, पड़ोसी का आदर कीजिए, समाज का अभिन्न अंग बनिए, पर्यावरण की चेतना करनी चाहिए. अपने पास धरती मां के अलावा रहने की दूसरी जगह नहीं है. उपराष्ट्रपति ने कहा कि जब प्रधानमंत्री ने देश को आह्वान किया कि मां के नाम एक पेड़ लगाओ, वो एक भावना को उजागृत करना था कि पांच हजार साल की संस्कृति के अंदर जो ज्ञान है पर्यावरण के लिए उसका हमें बोध होना चाहिए. अब ये जन आंदोलन बन गया है इसका ध्यान रखिए. उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि भारत विश्व में संस्कृति का केंद्र है, कोई भी देश इस पर उतना गर्व नहीं कर सकता जितना हम कर सकते हैं, क्योंकि हमारे पास 5,000 वर्ष पुराने सभ्यतागत लोकाचार हैं. हमारी सांस्कृतिक विरासत, सांस्कृतिक सभ्यता, ज्ञान का भंडार अद्वितीय है. ऐसी स्थिति में हमें अपने सांस्कृतिक मूल्यों का पोषण करना चाहिए. आत्मनिर्भरता. उपराष्ट्रपति ने कहा कि महात्मा गांधी ने कहा था- स्वदेशी, एक शब्द था, जिसने उस समय की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया. खादी के उपयोग से इसकी शुरुआत हुई. वर्तमान प्रधानमंत्री ने इसको एक नया आयाम दिया है- वोकल फार लोकल. आपसे आग्रह करूंगा कि गंभीरता से इसका पालन कीजिए. और हर व्यक्ति के कुछ कर्तव्य हैं. उपराष्ट्रपति ने कहा कि अधिकारों की बात हम करते हैं क्योंकि भारत के संविधान में हमें अधिकार मिले हैं, जिन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है. पर भारत के संविधान में मौलिक दायित्व भी हैं और इसके लिए संविधान को देखने की आवश्यकता नहीं है. हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि हमारा दायित्व क्या है. हमें अपने नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन पूरी लगन से करना चाहिए, और यह जब हम करेंगे तो नतीजे निकलेंगे. पहला – हम आगे बढ़ेंगे और विकसित भारत की प्राप्ति के लिए यह यात्रा तेज होगी. हम औपनिवेशिक मानसिकता से खुद को मुक्त करेंगे.