अश्लीलता की हद को रोकने सदन में उठेगी आवाज : श्रेयसी
बिहार संवादी में नेशनल शूटर व विधायक ने कहा, बिहार में बेटियां प्रगति पथ पर, समाज दे साथ
जागरण संवाददाता, पटना : ज्ञान व लोक संस्कृति की भूमि बिहार। प्राचीन इतिहास से लेकर आधुनिक काल में बेटियों ने हर क्षेत्र में अपने कीर्तिमान स्थापित किए हैं। खेल से लेकर साहित्य, रंगमंच से लेकर राजनीति के गलियारों में आधी आबादी का हस्तक्षेप इस बात का गवाह है कि अवसर के साथ समाज का साथ मिले तो बेटियां बेटों से दो कदम आगे बढ़कर समाज व राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं।
बिहार संवादी के मंच पर बेटियों के व्यक्तित्व के सुंदर चित्रण के बीच उनकी अपेक्षा पर वक्ताओं ने समाज के बीच प्रश्न भी रखे। खेल से लेकर राजनीति की सशक्त हस्ताक्षर नेशनल शूटर व विधायक श्रेयसी सिंह से दैनिक जागरण के वरीय समाचार संपादक अश्विनी कुमार सिंह के बीच हुए सार्थक संवाद के श्रोता साक्षी बने। बिहार के पुराने दिनों की स्मृतियां इसमें पिछड़ापन, बेटियों के प्रति समाज का सोच, पितृसत्ता का प्रभावी होना सारे दृश्य लोगों के सामने मानो जीवंत हो रहे थे। खेल पर जब बात छिड़ी तो बात सामने आई कि इस क्षेत्र में बिहार की गति धीमी रही। अब मेडल लाओ और नौकरी पाओ की बात खिलाड़ियों के लिए सुनहरे अवसर के रूप में सामने आई है। 2009 में खेल में स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी खिलाड़ियों को कोई मान-सम्मान नहीं होना दर्द को बयां करता रहा। श्रेयसी कहती हैं कि उन्हें इससे थोड़ी निराशा थी, पर उनके पिता दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमारा राज्य आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है। पर, मां-बाप गरीब होते हैं तो बच्चे साथ नहीं छोड़ते। इसी भावनात्मक उम्मीद के साथ खेल व खिलाड़ी प्रदेश की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनाने को अपना योगदान देते रहे। समय बदला, आज खिलाड़ियों के कद भी बढ़े। सरकार ने खेलों के प्रति जागरूकता दिखाई तो मेडलों की भरमार लगी। प्रदेश में खेल स्टेडियम बने और विश्व पटल पर प्रदेश की छवि बदली। श्रेयसी उदाहरण देती हैं कि शांभवी चौधरी सबसे कम उम्र की सांसद बनीं, मैंने विधायक रहते ओलिंपिक में भाग लिया, यह बिहार की बेटियों के बदलाव की कहानी है। बात उनके स्वाभिमान और अस्मिता पर भी पहुंची कि आज इंटरनेट प्लेटफार्म का प्रयोग करते हुए अश्लीलता की हद पार हो रही है। क्या बिहार देश को दिशा और संदेश देगा? क्या इस पर कड़े कानून की पहल की गूंज सदन में गूंजेगी, श्रेयसी ने बिहार संवादी के मंच से आश्वस्त किया वे इस प्रश्न को सदन में दृढ़ता से उठाएंगी। यह सही मुद्दा है। घर से लेकर सदन तक बेटियों की राहों में आज भी चुनौतियां हैं। पितृ सत्ता से बंधी बेटियां परिवार के सहयोग से आत्मनिर्भर बन कीर्तिमान बनाने में सफल हो सकती हैं। नारी शक्ति को सिर्फ शारीरिक ढांचे में न बांध कर उनके अंदर की ऊर्जा को बल देने की जरूरत है।