साहित्य का गोलमेज : विचारधारा थोपने ने साहित्य को पहुंचाया सबसे ज्यादा नुकसान

– यह भी पक्ष आया सामने, रचनाओं में रखेंगे एजेंडा, जिन्हें पसंद आएगा, वो पढ़ेंगे ही

– सटीक उत्तर की प्रतीक्षा में पुरानी फिल्मों की तरह पुस्तकों के भी पुन: प्रकाशन का प्रश्न

नीरज कुमार, जागरण, पटना :

समय-समय पर लेखकों द्वारा साहित्य की आड़ में एक खास विचारधारा थोपने के कारण ही आज पाठकों का संकट पैदा हो गया है। कई रचनाओं को आज पाठक नहीं मिल रहे हैं। इससे लेखक और प्रकाशक दोनों परेशान हैं। यह एक गंभीर खतरे का संकेत हैं। जब-जब यह स्थिति पैदा हुई है, तब-तब लेखकों को पाठक खोजने पड़े हैं। लेखकों ने जब साहित्य के माध्यम से समाज को दिशा दिखाने का प्रयास किया तो पाठकों ने भी उन्हें हाथोंहाथ लिया। वैसे लेखकों को पाठक की कभी कमी नहीं रही है। ये विचार दैनिक जागरण की ओर से आयोजित बिहार संवादी कार्यक्रम के दौरान मंचासीन वक्ताओं ने व्यक्त किए।

कार्यक्रम के संचालनकर्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने लेखकों से सीधा सवाल किया कि आपलोगों को आजकल पाठक क्यों नहीं मिल रहे हैं? थोड़ी देर के लिए तो सभागार में शांति छा गई, तभी वरिष्ठ लेखक इंदुशेखर तत्पुरुष ने मोर्चा संभाला। साफगोई से स्वीकार किया कि लेखकों ने अपनी विचारधारा से साहित्य जगत का ही गला घोंट दिया। विचारधारा थोपने के कारण ही आजकल पुस्तकों को पाठक नहीं मिल रहे हैं। वहीं वरिष्ठ लेखक रत्नेश्वर ने युवा लेखकों को सलाह दी कि अपनी रचनाओं में नए-नए प्रयोग करना सीखें, तभी युवा पीढ़ी उन्हें अपनी पसंद बना सकती है।

हालांकि, युवा लेखक सर्वेश तिवारी ने पक्ष रखा कि वह आगे भी अपनी रचनाओं में अपना एजेंडा रखने का प्रयास करेंगे, जिन्हें पसंद आएगा, वे मेरी रचनाओं को पढ़ेंगे और जिन्हें पसंद नहीं आएगा, वे मेरी पुस्तकों को फाड़कर फेंक देंगे।  सभागार में कर्तल ध्वनि से इस विचार का भी स्वागत किया गया। हालांकि, मंच पर विराजमान सभी लेखकों ने एक बात पर सहमति जताई कि वर्तमान दौर में लेखकों को पाठकों की नब्ज पहचानने की जरूरत है। तभी उनकी पुस्तकों को प्रकाशक मिलेंगे। चर्चा आगे बढ़ी तो सभी लेखकों ने जोर दिया कि यह बदलाव का दौर है। फिल्मों में काफी बदलाव हुए हैं। उसके बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं। दर्शक भी खूब पसंद कर रहे हैं। ऐसे में साहित्य जगत में भी बदलाव की जरूरत है। समय के साथ न बदलने वाले साहित्यकार ही आज घास काट रहे हैं। इस तरह की स्थिति समाज के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिल रही है। कई लेखकों की राय थी कि साहित्य को हमेशा सत्ता के विरोध में खड़ा होना चाहिए, तभी उसे पाठक पसंद करेंगे। अपने तर्कों को सही सिद्ध करने के लिए कई उदाहरण दिए। संचालनकर्ता ने लेखकों का ध्यान आकृष्ट किया कि आज के दौर में भी धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुनाहों का देवता’ खूब बिक रही है। बाबा नागार्जुन भी काफी पढ़े जा रहे हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर प्रासंगिक हैं। इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या जिस तरह पुरानी फिल्में पुन: रीलिज करने का दौर चल रहा है, उसी तरह पुस्तकों का भी पुन: प्रकाशन शुरू किया जाए। यह सवाल सभागार में काफी देर तक तैरता रहा, परंतु किसी ने इसका सटीक उत्तर नहीं दिया। कार्यक्रम के दौरान साहित्य में नैतिक मूल्यों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। श्रोताओं ने साहित्य व धर्म एवं महिलाओं पर हो रहे अत्याचार जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाया। रचनाओं के माध्यम से कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान भी याद की गईं।