बिहार संवादी :  पाठकों की कमी नहीं, संघर्ष की कहानी लिखें

तृतीय सत्र:::

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नीरज कुमार

जागरण, पटना : पुस्तकों का प्रकाशन लेखकों के लिए हमेशा एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। खासकर नये लेखकों को तो अपनी पुस्तक का प्रकाशन कराने में ही पसीना छूट जाता है। इसके बाद समस्या होती है पाठकों की। पुस्तक के प्रकाशन होने के बाद उसे पाठकों तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं है। उसके बाद सवाल उठता है कि पाठक पुस्तक को पसंद करते हैं या नहीं। अगर पाठकों ने पुस्तकों को पसंद किया तब तो कोई बात नहीं। लेकिन अगर पुस्तक पाठकों को पसंद नहीं आई तो लेखक के लिए बड़ी मुश्किल पैदा हो जाती है। ये विचार शनिवार को दैनिक जागरण द्वारा आयोजित बिहार संवादी कार्यक्रम में जागरण हिंदी के बेस्ट सेलर लेखक सर्वेश तिवारी, उपन्यासकार कैलाश विश्नोई एवं कथाकार अनुलता राज नायर ने पाठकों से साझा किए। कार्यक्रम का संचालन उपन्यासकार नवीन चौधरी ने किया। मंच साझा करने वाले युवा लेखकों ने अपनी रचनाओं से काफी सरहना बटोरी है। लेखक सर्वेश तिवारी ने अपनी रचनाओं से पाठकों में नया सोच पैदा करने की कोशिश की है। इस मंच पर भी उन्होंने पाठकों से सीधा संवाद किया और अपने तर्कों से संचालनकर्ता के प्रश्नों का सटीक जवाब देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों को नये सिरे से कसौटी पर कसने की जरूरत जताई। कैलाश विश्नोई ने युवा पीढ़ी के संघर्ष को अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की है। खासकर यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं को अपनी रचनाओं का एक बड़ा पाठक वर्ग बताया। प्रत्येक वर्ष लगभग दस लाख विद्यार्थी यूपीएससी के लिए आवेदन करते हैं। इनके संघर्षों की कहानी अगर रोचक तरीके से लिखी जाए तो पाठकों की कमी नहीं है। कथाकार अनुलता राज नायर ने लेखकों को प्रेरित किया कि अब पाठकों तक पहुंचने के लिए कई माध्यम तैयार हैं। बस आपकी रचनाओं में दम होना चाहिए, तभी पाठक भी उसे पसंद करेंगे। तभी प्रशासक भी मिलेंगे और बाजार भी। नये लेखक पुस्तकों के साथ-साथ दूसरे माध्यम से भी पाठकों तक पहुंच सकते हैं। लेखकों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अगर प्रकाशक आगे नहीं आ रहे हैं तो स्वयं पुस्तकों को प्रकाशित कर पाठकों तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। तभी भविष्य में पहचान बन सकती है। यह सही है कि शुरू में नये लेखकों को प्रकाशक नहीं मिलते हैं। परंतु धीरे-धीरे यह समस्या दूर हो जाती है और पाठक भी लेखकों से जुड़ने लगते हैं। पाठकों की मांग पर प्रकाशक भी लेखकों तक पहुंचने लगते हैं।