संवादी: रील में लिपटकर स्क्रीन पर दिखते हैं संस्कार

चौथा सत्र  : ‘बिहार के रील के सितारे’

अक्षय पांडेय, जागरण

पटना : बिहार संवादी में साहित्य के शब्दों से हर दौर को ठौर मिलने के बाद बारी इंटरनेट की सीढ़ियों पर फर्राटा भरने की आई। चौथे सत्र ‘बिहार के रील के सितारे’ में इस विधा के महारथियों ने मंच चमकाया। यू-ट्यूबर मिंटुआ, हास्य कलाकार सौरभ और आरजे अंजलि से मनोज पांडेय की बातचीत का निष्कर्ष निकला कि इंटरनेट पर परोसी गई सामग्री हमारी परवरिश को बयां करती है। हर चीज के लिए दायरा बना है, मिश्रण न करें। तीनों युवाओं ने भाषा पर भी चिंता व्यक्त की। संदेश दिया कि बिहार के पढ़े-लिखे लोग बच्चों को भाषा का ज्ञान नहीं दे रहे हैं।

व्यूज के लिए कुछ भी न बनाएं

मां एवं साथी कलाकार सोनाली सिंह राजपूत के साथ कार्यक्रम में पहुंचे यू-ट्यूबर मिंटुआ ने दर्शकों की मांग पर प्रस्तुति दी और अपनी रील यात्रा का वर्णन किया। माता-पिता को इंटरनेट सामग्री के निर्माण में सबसे बड़ा सहयोगी बताया। अपनी विधा में आने वाली परेशानियों को सामने रखते हुए कहा कि रील बनाना शुरू करने पर विरोध का सामना किया, बाद में नाराज लोग साथी बने। अपनी भाषा पर गर्व करने की वकालत की। इस बात पर जोर दिया कि भाषा और संस्कृति प्रचार-प्रसार से समृद्ध होगी। चर्चा के दौरान इंटरनेट मीडिया पर आ रही अश्लील सामग्री पर विचार रखते हुए कहा कि व्यूज के लिए कुछ भी न बनाएं। अपनी जिम्मेदारी समझें, क्योंकि क्रिएटर (निर्माता) इंटरनेट की सामग्री से अपनी परवरिश भी दिखाता है। मिंटुआ ने युवाओं को संदेश दिया कि सच्चा आर्टिस्ट आर्ट बनाता है, वर्ग अपने आप तय हो जाता है।

बिहारी होने का कोई नुकसान नहीं

हास्य कलाकार सौरभ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मिमिक्री कर श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। सौरभ ने इस बात से पर्दा हटाया कि दूसरे राज्यों में बिहारी होने का कोई नुकसान नहीं है। जल्द निराश होने वालों के अंदर जोश भरते हुए कहा कि इंसान में जब कोई कमी नहीं दिखती, तो लोग आलोचना करने लगते हैं। इससे डरना नहीं है। रील में लिपटकर आ रही फूहड़ सामग्री पर कहा कि कुछ लोगों को गंदा देखना-सुनना ही पसंद होता है, पर ऐसा मनोरंजन तात्कालीक है। गाली-गलौज में मेहनत कम है, इनकम ज्यादा है, पर यह लंबे समय के लिए नहीं। उदाहरण दिया कि जैसे फेसबुक लाइट है, वैसे फेसबुक एडल्ट क्यों नहीं हो सकता। हर वर्ग के लिए अलग प्लेटफार्म होना चाहिए। हर आदमी कुछ भी न देख पाए। व्यूज के लिए परेशान लोगों से कहा कि शार्टकट न अपनाएं। खुद के अनुभव से टेलीविजन रीयालिटी शो की सच्चाई बताते हुए कहा कि सब टीआरपी का खेल है। टीआरपी मिलेगी तो आप टीवी वालों के लिए भगवान हैं।

सबके लिए दायरे, मिश्रण न करें

आरजे अंजलि ने खुद को बेहतर बनाने के लिए रेडियो और इंटरनेट मीडिया का शुक्रिया किया। कहा कि केवल अंग्रेजी-हिंदी में बंधकर न रह जाएं। मैथिली, मगही, बज्जिका आदि राज्य की भाषा की बच्चों को सीख देने के लिए अभिभावक कदम उठाएं। इसके लिए बिहार की शिक्षा प्रणाली में बदलाव पर जोर दिया। कहा कि यहां ए, बी, सी, डी के बाद यूपीएससी आता है। इसके अलावा भी दुनिया है। विचार दिया कि सरकारी नौकरी के लिए बनने वाले पाठ्यक्रम में राज्य की एक भाषा का भी ज्ञान दिया जाए। अंजलि ने इंटरनेट की सामग्री में जिम्मेदारी अधिक होने की बात कही। कुछ भी परोसे जाने वाले कंटेंट पर कहा कि सबके लिए दायरे बने हैं, मिश्रण कर कुछ बेहतर नहीं किया जा सकता। नीति तय करने वाले इसकी जिम्मेदारी लें कि किसे क्या दिखाना है। इंटरनेट पर बेहतर सामग्री तैयार करने वालों को नसीहत दी कि कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, घर में ही बहुत कुछ है। एक दिन काम करके न छोड़ें, रोज कुछ न कुछ अपलोड करें।