पटना सबरंग : बाग की तरह विकसित हो अपना पटना
मुख्य सचिव वीएस दूबे, पूर्व डीजीपी अभयानंद, लेखक अरुण सिंह ने पाटलिपुत्र से अजीमाबाद और उसके बाद पटना के विविध रंगों पर अपने विचार साझा किए
जयशंकर बिहारी, पटना :
हर पुरानी चीज अच्छी नहीं और हर बदलाव खराब नहीं होता है। पाटलिपुत्र से अजीमाबाद और उसके बाद पटना के सफर में इस शहर ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। एक दौर में दक्षिण एशिया के अधिकांश क्षेत्र के शासन का यह केंद्र हुआ करता था। इसने पतन भी देखा और उत्थान भी। पिछले सात-आठ दशकों में पटना की आबादी कई गुना बढ़ी। उसकी तुलना में विविध क्षेत्रों में अपेक्षित बदलाव के साथ यह कदमताल नहीं कर सका।
बिहार संवादी में बिहार व झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव रहे वीएस दूबे, आइआइटी प्रवेश परीक्षा के मार्गदर्शक सह पूर्व डीजीपी अभयानंद, पटना के विविध रंगां से जुड़े पुस्तकों के लेखक अरुण सिंह ने इतिहास और वर्तमान की सीख पर भविष्य के पटना का स्वरूप साझा किया।
सत्र संचालन हृदय रोग विशेषज्ञ सह संस्कृतिकर्मी डा. अजीत प्रधान ने किया। अभयानंद ने कहा कि पटना का फैलाव तेजी से हुआ। पटना का स्वरूप अनियोजित हो गया है। इसे बाग की तरह विकसित करने की जरूरत है। वह बचपन के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि बच्चों को खेलने के लिए हर मोहल्लों के आसपास पर खुला स्थान होता था। गांधी मैदान में स्कूली छात्रों के लिए स्थान चिह्नित होते थे। आज बच्चों के पास खुले में खेलने के विकल्प बहुत ही कम हो गए हैं। डा. अजीत प्रधान और अरुण सिंह ने अजीमाबाद पर रोशनी डालते हुए उस दौर के रंगीन मिजाज का अहसास कराया। पटना गंगा-जमुनी तहजीब का मिसाल रहा है। पर्व-त्योहार या आयोजन की पूर्णता एक-दूसरे की सहभागिता के बगैर संभव नहीं था। इसका रंग आज भी पटना में देखने का मिलता है।
रातभर जागने वाला शहर है पटना :
पटना के 1974 से 77 तक जिलाधिकारी रहे विजय शंकर दूबे का इस शहर से सात दशकों का गहरा नाता है। उन्होंने कहा कि जन्म उत्तरप्रदेश में हुआ, लेकिन इस शहर ने हमें और हमने इस शहर को अपना बना लिया है। चंद दशक पहले तक कोई ऐसा मोहल्ला नहीं होता था जहां दशहरे में नौ दिनों तक बड़े कलाकारों का कार्यक्रम नहीं होता था। पूरी रात पटना जागता था। खुले में बड़े-बड़े पंडाल होते थे। इसे आगे बढ़ाते हुए अभयानंद ने कहा कि भीड़ को संभालने के लिए पुलिस और प्रशासन की जरूरत नहीं पड़ती थी। शहरवासी रातभर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बड़े उत्साह से रातभर आते-जाते थे। हमारे स्वभाव में भी बदलाव आया है, पहले जिन बातों को हम बोलकर दूसरे को समझा दिया करते थे, आज इसमें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पूर्वी पटना को गंगा से खतरा नहीं :
वीएस दूबे ने श्रोताओं की इच्छा पर 1975 के बाढ़ की कहानी को बयान किया। सोन तट को सेना या जिला प्रशासन द्वारा दानापुर छावनी को बचाने के लिए तोड़े जाने की बात को सिर्फ अफवाह और हकीकत से दूर बताया। उन्होंने कहा कि 19 से 22 अगस्त, 1975 को पूरे उत्तरी भारत में भारी वर्षा हुई थी। इसका केंद्र बनारस था। सोन नदी में मानसून में तीन से चार लाख क्यूसेक पानी के बहाव की क्षमता होती है। 23 अगस्त को 1400 लाख से अधिक क्यूसेक पानी था। वहीं, गंगा में सरयू और बनारस की ओर से पहले ही काफी पानी आ रहा था। इस कारण सोन का पानी गंगा में नहीं जा रहा था। नतीजन तटबंध टूटे। गांधी मैदान के चारों तरफ तीन से चार फीट तक पानी था। पटना सिटी का क्षेत्र ऊंचा होने के कारण वहां पानी था। पाटलिपुत्र और बोरिंग रोड क्षेत्र में 10 से 15 फीट तक पानी था। मकान का निचला तल डूब गया था।