बक्सर: “थकने का समय नहीं है बाबू! जब आत्मा कविता सुन लेती है, तो शरीर को आराम की जरूरत नहीं रहती। और वैसे भी- हमारा पार्वती निवास कोई साधारण मकान थोड़े है, यह तो साहित्य का ससुराल है!” कहने वाले साहित्यकार डा ओमप्रकाश केसरी ‘पवन नंदन’ के निधन से पूर्वांचल के साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई. वे करीब 75 वर्ष के थे. डा पवन नंदन कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी अमूल्य रचनाएं देने वाले इस प्रख्यात साहित्यकार ने अपना पूरा जीवन साहित्य और समाज सेवा को समर्पित किया था. डा पवन नंदन ने हिंदी और भोजपुरी में लगभग 50 पुस्तकों की रचना की थी. उनकी कहानियां, लघुकथाएं, व्यंग्य, कविताएं, गजलें और नाटक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. उनकी रचनाएं समाज का एक जीता-जागता दस्तावेज मानी जाती हैं. उन्होंने कई नवोदित साहित्यकारों को मंच प्रदान किया और उनकी प्रतिभा को निखारने का कार्य किया. साहित्य सेवा के साथ-साथ डा ओमप्रकाश केसरी समाज सेवा में भी सक्रिय रहे. उन्होंने अपने देहदान की घोषणा पहले ही कर दी थी, जिससे उनके शरीर के अंग जरूरतमंद लोगों के काम आ सकें. उनका यह निर्णय समाज के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है.

याद रहे कि डा ओम प्रकाश केसरी ‘पवननंदन’ को राष्ट्रीय स्तर पर 100 से अधिक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे. उन्हें वाराणसी में 2015 और कोलकाता में 2016 में ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से नवाजा गया था. इसके अलावा, उन्हें ‘विद्यावाचस्पति’ (पीएचडी) और ‘विद्यासागर’ (डीलिट्) जैसी प्रतिष्ठित मानद उपाधियां भी प्राप्त हुई थीं. साहित्य, समाज और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा. उनकी पत्नी का पहले ही निधन हो चुका था. वे अपने पीछे पुत्र-पुत्री, नाती-पोतों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. डा पवन नंदन के निधन पर वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा, गणेश उपाध्याय, डा शशांक शेखर, डा महेंद्र प्रसाद, राजा रमण पांडेय, बजरंगी मिश्रा, डा श्रवण कुमार तिवारी, अतुल मोहन प्रसाद, अशोक कुमार केशरी, देहाती पंडित, दयानंद केशरी, दीपक केशरी, शिव बहादुर पांडेय प्रीतम, सुरेंद्र कुमार, मन्नु मद्धेशिया, मीना सिंह और कंचन देवी सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया.