नई दिल्ली: ओड़िआ के महान कवियों में शुमार रमाकांत रथ का निधन भारतीय साहित्य जगत के लिए शोक लेकर आया है. वे ऐसे समय गये, जब उनकी आवश्यकता थी. अपनी कविताओं में श्री राधा और श्री कृष्ण के साथ उन्होंने मृत्यु की आहट को भी सुन लिया था, इसलिए कई कविताएं इसी पर लिखीं. यह यों ही नहीं है कि रथ के जाने पर साहित्य जगत के साथ समूचे राष्ट्र ने अपने-अपने ढंग से उन्हें याद किया. भुबनेश्वर के खारवेल नगर में 91 वर्ष की उम्र में रथ के जाने की सूचना मिलते ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शोक जताया. साहित्य जगत तो मर्माहत हुआ ही. राष्ट्रपति मुर्मु ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि प्रख्यात कवि श्री रमाकांत रथ जी के निधन के बारे में जानकर मुझे बहुत दुख हुआ है. श्री रमाकांत रथ भारतीय साहित्य जगत की एक प्रमुख विभूति थे. उन्हें पदम् भूषण सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. ओड़िआ साहित्य में अपने चिरस्मरणीय योगदान द्वारा उन्होंने अखिल भारतीय साहित्य को समृद्ध किया है. मैं उनके शोक संतप्त परिवारजनों और प्रशंसकों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करती हूं.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने आधिकारिक कार्यालयीय हैंडल से एक्स पर लिखा कि श्री रमाकांत रथ जी ने एक प्रभावी प्रशासक और विद्वान के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई. उनकी रचनाएं, खासतौर पर कविताएं, समाज के सभी वर्गों में व्यापक रूप से लोकप्रिय हैं. उनके निधन से दुखी हूं. दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ है. ओम शांति: ओड़िशा के कई नेताओं और प्रतिष्ठित हस्तियों ने रथ के निधन पर शोक व्यक्त किया और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उनके घर पहुंचे. रथ के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए ओड़िशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा कि रमाकांत रथ को भारतीय प्रशासनिक सेवा और साहित्य की दुनिया में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा. माझी ने शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की. याद रहे कि रथ का जन्म 13 दिसंबर, 1934 को कटक में हुआ था. रावेनशा कालेज जो अब विश्वविद्यालय है से अंग्रेजी साहित्य में एमए पूरा करने के बाद आप 1957 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए. आप ओड़िआ भाषा लेकर इस सेवा में चुने जाने वाले पहले अधिकारी थे. ओड़िशा राज्य और केंद्र दोनों सरकारों में कई महत्त्वपूर्ण पदों पर रहने के बाद 1992 में आप ओड़िशा के मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए थे.