भारतीय चिंतन में सत्ता भी लेती है ऋषि-मुनियों का मार्गदर्शन

उद्घाटन सत्र

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संवाद से सिंचित-पल्लवित होता रहा बिहार संवादी का बोधि वृक्ष

राज्यपाल ने भारतीय संस्कृति की ज्ञान परंपरा और ज्ञान भूमि बिहार की मीमांसा की

प्रो. संजय पासवान ने बताया संवादी का अर्थ, कहा-जिस भाव में कथन उसी में प्रेषण

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जागरण संवाददाता, पटना : प्रायः विभिन्न आयोजनों का उद्घाटन दीप प्रज्वलन से होता है, लेकिन ज्ञान भूमि बिहार की धरा पर दो दिवसीय बिहार संवादी के आयोजन में उद्घाटन बोधि वृक्ष का जलकलश से अभिसिंचन कर किया गया। उद्घाटन के भाव के अनुरूप विभिन्न विषयों में संवाद से बिहार संवादी का बोधि वृक्ष सिंचित पल्लवित होता रहा। बिहार के राज्यपाल डा. आरिफ मोहम्मद खां ने भारतीय ज्ञान परंपरा की मीमांसा और उसकी महत्ता को सहज शब्दों में रेखांकित किया। उन्होंने समाज के लिए एकता की आवश्यकता और इस आवश्यकता के लिए समानता के तत्व के रूप में आत्मा व परमात्मा की महत्ता को परिभाषित किया तो उपस्थित जन अपने हाथों को न रोक सके और तालियों से सभागार गूंजता रहा।

संवाद को संस्कृति का हिस्सा बताते हुए राज्यपाल ने कहा कि प्रश्न अति आवश्यक हैं। इसे स्वीकार करें, उसका सम्मान करें। एक जिज्ञासा दूसरी जिज्ञासा को जन्म देती है और जिज्ञासु परम ज्ञान प्राप्त करता है। यही हमारी शक्ति का आधार है। भारतीय संस्कृति से प्राचीन संस्कृतियां भी रही हैं, लेकिन वह कहां हैं।  मिश्र और यूनान को देखें, उनका अपनी पुरानी संस्कृति से जीवंत रिश्ता नहीं रहा। जिनका है भी, वह उस विषय के अध्ययन के लिए है। लेकिन, भारतीय संस्कृति के जो आदर्श और मूल्य हजारों वर्ष पहले थे, वही आज भी हैं, क्योंकि हमारा हमारी प्राचीन संस्कृति से जीवंत रिश्ता हैं। यह ज्ञान संवर्धन का परिणाम है।

ज्ञान संवर्धन को परमात्मा से जोड़ते हुए कहा कि समाज की स्थिरता के लिए एकता चाहिए जो समानता से संभव है। अन्य संस्कृतियों में  वंश, त्वचा, भाषा, आस्था की अभिव्यक्ति आधार तत्व रहे। लेकिन, भारतीय संस्कृति ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि सबका रंग, सबकी भाषा, पूजा पद्धति एक नहीं हो सकती। भारतीय संस्कृति ने आधार चुना आत्मा को। जो सबमें उपस्थित है, वही परमात्मा है। वही प्रज्ञानम ब्रह्मा यानी सामूहिक चेतना है, बुद्धिमत्ता है। आप चाहे जो कुछ पढ़ें..उसका परिणाम आपके मन और बुद्धि के विकास पर होगा और यही आत्मज्ञान के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। हमारा लक्ष्य है आत्मज्ञान और संवर्धन, सत्ता नहीं। इस देश में सत्ता पर बैठे लोग कभी समाज का आदर्श नहीं रहे। साधु-संन्यासी, ऋषि-महर्षि, मुनि उन्होंने प्रेरणा दी। सत्ता में बैठे लोग तो जूते उतारकर, पैदल चलकर उनके पास मार्गदर्शन के लिए पहुंचते थे। राजा जनक खुद चलकर जाते थे याज्ञवल्क्य के पास। यही भारतीय आदर्श है। इसी तत्व ने बिहार की इस धरा पर बुद्ध को ज्ञान दिया था। भगवान बुदध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद कहा था कि दुख जीवन का आवश्यक हिस्सा है, उससे मुक्ति नहीं हो सकती है। लेकिन, दुखी होने से बचा जा सकता है। चिंता हो या आनंद, उसे सहेजना नहीं है। जैसा है उसे स्वीकार करना है।

विविधता को सहें नहीं, स्वीकार करें

हमारे विचारकों ने विविधता में एकता के तत्व को समाहित किया है। विविधता नैसर्गिक है। इसे सहन नहीं, स्वीकार करना है। इसका सम्मान करना है। लेकिन, वही विचारक यह भी बता गए कि जब ज्ञान प्राप्त करोगे तब यह बात पता चलेगी कि सामने से नजर आने वाली इस विविधता के पीछे एक मूलभूत एकता है। जो उस मूलभूत एकता को नहीं देखेगा, वह मृत्यु से मृत्यु तक की यात्रा करता रहेगा। उसे मुक्ति नहीं मिलेगी।

ज्ञान और संवर्धन के लिए जानी जाती है भारतीय प्रज्ञा

राज्यपाल ने कहा कि दसवीं और 11वीं शताब्दी में जब यूरोप पुनर्जागरण के प्रारंभिक काल में था,मध्य एशिया बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र था। उस समय इब्ने तबरी से इब्ने खल्दून तक पूरी दुनिया का इतिहास लिखा गया।  हर एक का इतिहास 10-10 खंडों का है। सबमें एक तथ्य समान है। पहले वाल्यूम का पहला चैप्टर, जिसमें सबने स्वीकार किया। दुनिया में पांच बड़ी सभ्यताएं हैं। ईरान अपने वैभव, रोम अपनी सुंदरता और महिलाओं के प्रति उदारता, चीन अपने कौशल, तुर्क अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते हैं। भारत दुनिया में अकेली ऐसी संस्कृति है, जो ज्ञान और प्रज्ञा के संवर्धन के लिए जानी जाती है। पैगंबर मोहम्मद साहब, जो कभी भारत नहीं आए.. मदीने में मस्जिद में बैठकर कहते हैं कि मैं भारत भूमि से ज्ञान की हवा के शीतल झोंके आते हुए महसूस कर रहा हूं। भारत की यह पहचान.. यह ज्ञान ही है जिसने भारत की संस्कृति को खत्म नहीं होने दिया।

संवाद के अनुवाद में हेरफेर नहीं नहीं होनी चाहिए : प्रो. संजय पासवान

पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री प्रो. संजय पासवान ने कहा कि विवाद करना है तो संवाद करना होगा। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि जो संवाद हो, उसी का प्रेषण हो। संवाद के अनुवाद में हेरफेर नहीं होना चाहिए। सही बात रखी जानी चाहिए। जनता जो कह रही है, जो सुन रही है, उसे कहना चाहिए। उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास संवदिया का उल्लेख करते हुए कहा कि संवदिया वह था, जो एक दूसरे तक संदेश पहुंचाने का कार्य करता था। उसके पास संवाद को उसी रूप और भाव में पहुंचाने की जिम्मेदारी थी, जिस भाव  में संदेश दिया गया था। यह चुनौती पूर्ण कार्य है और जागरण इसी कार्य को कर रहा है। जो उचित संवाद करते हैं, वह आगे तक जाते हैं। हमारे प्रधानमंत्री बेहतर संवाद स्थापित करते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी अच्छे संवाद कर्ता हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय ज्ञान का समय है। यह ज्ञान जगत है और समाज में ज्ञान की सशक्त भूमिका है। ज्ञान संवाद से संभव है। बेहतर संवाद से विवाद का समाधान होता है। जहां संवाद नहीं है, वहीं पर विवाद है। आज कहा जा रहा है  कि प्लेनट. पीपुल, पीस, प्रासपैरिटी, पार्टनरशिप प्राब्लम में है क्योंकि संवाद नहीं हो रहा है। व्यवधान है तो समाधान भी है। संवाद का निर्माण तब होता है, जब लोगों का दिल से दिल मिलता है। यह कनेक्ट करने का प्रयास है। बिहार लोकतंत्र की  धरती है। जनक और याज्ञवल्क्य की धरती है। यह बहुत समावेशी रही है। इसने सबको स्वीकार किया है। सम्मान किया है। बोझ मानकर सहन नहीं किया है। प्रो. पासवान ने कार्यक्रम से जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि आइये संवादी बने। उंत्सव को उत्साह बनाए।  उमंग पैदा करें।