बिहार के बिना भारत की राजनीति अधूरी, आधुनिकता में ही भविष्य

प्रथम सत्र::::

प्रख्यात लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर ने कहा, मुगलकाल से ब्रिटिश शासन तक ने बिहार को जरूरी समझा

अमित रंजन, जागरण

पटना : भारत के राजनीतिक व आर्थिक ताना-बाना में बिहार की प्रमुख भूमिका रही है। इसे कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। दैनिक जागरण के मंच पर बिहार संवादी में वरिष्ठ पत्रकार, प्रसिद्ध लेखक व पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर के साथ संवाद में यह निहितार्थ बिहार के सोच को बयां करते नजर आए। विषय था-बिहार, जैसा मैंने देखा।

एमजे अकबर से दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर अनंत विजय बात कर रहे थे। एमजे ने अपने गहन विश्लेषण से बिहार के ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को व्यापक दृष्टि से प्रस्तुत किया। इसमें बिहार का ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव, आधुनिक दौर में उसकी प्रगति और भविष्य की संभावनाओं पर दृष्टिकोण था। बिहार का ऐतिहासिक महत्व भारत के राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने में हमेशा से प्रमुख रहा है। 1950 के दौर में बिहार की प्रशासनिक दक्षता के कारण “बेस्ट गवर्नेंस स्टेट” घोषित किया गया था। यह स्थिति 1965-67 के राजनीतिक भूकंप तक बनी रही, जब देश के कई राज्यों से कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद बिहार ने सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता के दौर का सामना किया। बिहार की सत्ता में आए बदलावों और अल्पकालिक मुख्यमंत्रियों ने राज्य की स्थिरता को प्रभावित किया।

एमजे ने ऐतिहासिक संदर्भों में बिहार की स्थिति को समझाते हुए कहा कि “जो भी मुगल दिल्ली में हुकूमत करता था, जब तक बिहार पर उसका नियंत्रण नहीं होता था, वह खुद को स्थिर नहीं मानता था।” उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार ऐतिहासिक रूप से आर्थिक और राजनीतिक तौर पर सशक्त रहा है, इसलिए मुगल शासकों से लेकर अंग्रेजों तक ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण करने का प्रयास किया। बिहार के क्षेत्र और कोलकाता उस समय आर्थिक समृद्धि के केंद्र थे, और अंग्रेजों ने इन्हीं कारणों से अपनी सत्ता यहां स्थापित की। बिहार का भविष्य क्या है? प्रश्न उठे तो उन्होंने आधुनिकता की वकालत की और इसे राज्य के विकास के लिए आवश्यक बताया। किसी भी समाज की प्रगति के लिए आजादी, विचारों की स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और आर्थिक सशक्तीकरण बेहद जरूरी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में हमेशा से अभिव्यक्ति की आजादी रही है और इसे कायम रखना आवश्यक है। उन्होंने इस पर जोर दिया कि आधुनिक दौर में किसी को भी गरीब बनाए रखना संभव नहीं है।

संवाद आगे बढ़ा, तो मुगल बादशाह औरंगजेब का एक प्रसंग साझा किया, जब उसने ‘मौसीकी’ (संगीत) पर प्रतिबंध लगाया था। इस पर दिल्ली के कलाकारों ने उसके सामने कंधे पर ‘मौसीकी’ की अर्थी निकालकर विरोध जताया था। उन्होंने बताया कि भारत में हमेशा से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रही है और इसे दबाया नहीं जा सकता। एमजे ने भारत में गरीबी उन्मूलन की दिशा में हुए कार्यों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजनाओं की सराहना की। जब 80 करोड़ लोगों को भोजन उपलब्ध कराया गया, तो यह भारतीय समाज में आर्थिक समानता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम था। जब एक श्रोता ने उनसे प्रधानमंत्री अंत्योदय योजना पर अदालत की टिप्पणी के बारे में पूछा, जिसमें कहा गया था कि यह योजना जनता को निकम्मा बना सकती है, तो एमजे ने इस विचार को खारिज करते हुए कहा, ऐसा प्रश्न पूछने से पहले दो दिन तक खाना मत खाइए। तब समझ आएगा कि यह कितना जरूरी है। पत्रकारिता की छात्रा सौम्या वर्मा ने जब यह पूछा कि क्या आप कभी डेडलाइन से चूके तो एमजे ने उसका हौसला बढ़ाते हुए उसे जवाब नहीं मिलने पर भी हमेशा सही सवाल पूछने की सलाह दी। बात यहां से होते हुए पत्रकारिता के महत्व और उसकी जिम्मेदारियों तक पहुंची। उन्होंने बिहार के चर्चित भागलपुर आंखफोड़वा कांड का उदाहरण देते हुए बताया कि पत्रकारिता का प्रभाव इतना गहरा हो सकता है कि इस समाचार के छपने से सरकार घबरा गई थी।

अनंत विजय के सवाल पर कि क्या एक संपादक को डिक्टेटर होना चाहिए या डेमोक्रेट? एमजे ने रोचक जवाब दिया। उनके अनुसार, संपादक को 12 घंटे में दो घंटे डिक्टेटर और 10 घंटे डेमोक्रेट होना चाहिए, अन्यथा पत्रकार केवल बातें करते रह जाएंगे और अखबार में कुछ भी नहीं छपेगा। पत्रकारिता में अनुशासन और डेडलाइन का पालन करना अनिवार्य है। जब अनंत विजय ने यह सवाल पूछा कि क्या वे जवाहर लाल नेहरू की जीवनी “द मेकिंग आफ इंडिया” में अब कुछ बदलाव करना चाहेंगे, उन्होंने इससे इन्कार किया, लेकिन यह कहने से भी नहीं चूके कि ‘केवल महान व्यक्ति ही महान गलतियां करते हैं।’

एमजे अकबर ने मध्यकालीन प्रसिद्ध मुस्लिम यात्री इब्न बतूता का हवाला दिया, जिसने दुनिया के सबसे प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांतों में से एक रिहला लिखा था। भारतीय ज्ञान को समझने के लिए उसने संस्कृत सीखी। मोरक्को के इस यात्री ने भारत की बावड़ियों को देखा, तो वह चकित रह गया। उसे आश्चर्य हुआ कि भले ही घुड़सवारों की ताकत से युद्ध जीते जाते हों, लेकिन भारतीयों के ज्ञान की गहराइयों के सामने वे कहीं नहीं ठहरते। उसने बताया कि यहां के लोग कभी कमजोर नहीं रहे। भारत में तलवारें कमजोर नहीं थीं, लेकिन बाहरी आक्रमणकारियों ने भारत को कमजोर इसलिए किया, क्योंकि कुछ लोगों ने ज्ञान को केवल अपने परिवार तक सीमित रखा। संवाद का समापन इस गहरे संदेश से हुआ कि ज्ञान उसी वक्त बढ़ता है जब इसे बांटा जाता है। ज्ञान जब सीमाओं में कैद होता है तो क्षीण हो जाता है, लेकिन जब बांटा जाता है तो उसे अनंत का विस्तार मिलता है।