संवादी :::::सांस्कृतिक समानता होने तक जरूरी हो आरक्षण

द्वितीय सत्र ::::

संविधान और आरक्षण विषय पर वक्ताओं ने रखे अपने विचार

जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार, डीयू के डा.राजकुमार फुलवारिया संग वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने किया संवाद

व्यास चंद्र, जागरण

पटना : आरक्षण की आवश्यकता किसके लिए और कब तक जैसे प्रश्नों पर कभी सदियों पूर्व की व्यवस्था से टकराते जवाब, कभी वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता की तलाश। बिहार संवादी में ‘संविधान और आरक्षण’ विषय पर आयोजित सत्र में वाद-विवाद का निष्कर्ष इस ओर पहुंचता हुआ कि समानता आने तक यह जरूरी है। हां, उनलोगों को मुख्यधारा में लाने पर अधिक जोर हो, जो इसी वंचित समाज का हिस्सा हैं, पर इस व्यवस्था के लाभ से वंचित।

संवादी में जेएनयू के समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. विवेक कुमार और दिल्ली विश्वविद्यालय के डा. राजकुमार फलवारिया के साथ बात कर रहे थे वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी। प्रो. विवेक कहते हैं कि आरक्षण जरूरी है। यह तब तक आवश्यक है, जब तक हाशिये पर बैठा समाज बराबरी पर नहीं आ जाता। आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कोई टूल नहीं है, इसे समझना होगा। क्या आरक्षण पर वोट की राजनीति का भी प्रभाव है? डा. फलवारिया कहते हैं, इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। इसके पीछे राजनीतिक लाभ का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। संवाद में गर्मी बढ़ती गई, प्रसंग रोचक होते चले गए। श्रोताओं ने इस वाद-विवाद को पूरी गंभीरता से सुना और अपने प्रश्नों के साथ इसका हिस्सा बने। बात बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर की हुई। डा. फलवारिया ने कहा कि बाबा साहेब केवल वंचित समाज के नहीं, सबके थे। उन्होंने संविधान के माध्यम से जो व्यवस्था देने का प्रयास किया, वह सभी के लिए है। वे संपूर्ण वर्ग के मसीहा थे।

हर्षवर्धन त्रिपाठी के प्रश्नों पर संवाद में गरमाहट भी आई। उन्होंने पूछा कि नियम कानून से आरक्षण तो दे देंगे, लेकिन क्या इससे सामाजिक प्रेम और भाइचारे पर असर नहीं पड़ेगा। दोनों वक्ताओं ने भी इस पर सहमति जताई कि यह कानून से संभव नहीं है। जब तक समाज तैयार नहीं होता, बदलाव लाना संभव नहीं। महाकुंभ की भी चर्चा हुई, जिसमें हर समाज के लोगों ने गंगा में एक साथ डुबकी लगाई।

प्रो. विवेक कुमार का कहना था कि हजारों वर्षों से सांस्कृतिक पूंजी से वंचित वर्ग को कुछ वर्षों के आरक्षण से बराबरी पर लाना संभव नहीं है। भले ही राष्ट्रपति पद को भी इस समाज के लोगों ने सुशोभित किया है, पर यह पद चुनाव से नहीं है। हमें इंतजार है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कोई अनुसूचित जाति-जनजाति का कोई नेता बैठे। यदि हम शीघ्र बदलाव चाहते हैं तो हमें उन वर्गों को स्व प्रतिनिधित्व देना होगा। इफेक्टिव डिसीजन मेकिंग बाडी में प्रतिनिधित्व देना होगा। आरक्षण की सीमा पर सवाल उठा तो प्रो.विवेक ने ईडब्ल्यूएस की चर्चा कर दी। बताया कि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इस क्रम में राष्ट्रपति पद के महत्व पर कुछ बातें आईं तो डा. राजकुमार फलवारिया एवं हर्षवर्धन त्रिपाठी ने असहमति जताई। इसके संदर्भ में डा. फलवारिया ने पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह एवं केआर नारायण द्वारा कई अधिनियम अस्वीकृत करने की चर्चा करते हुए बताया कि इस पद में शक्ति निहित है। उनका कहना था कि आरक्षण समस्या का समाधान नहीं है। हालांकि यह जरूरी है। जिस तरह घर में कोई बीमार होता है तो मां उसे विशेष तवज्जो देती है। उसी तरह जब तक पिछड़ापन है, तब तक आरक्षण रहना ही चाहिए।

संवाद में श्रोताओं ने कई प्रश्न किए। चंद्रशेखर सिंह ने एससी-एसटी में क्रीमीलेयर के औचित्य पर सवाल किया तो प्रो.विवेक कुमार ने इसे सिरे से नकार दिया। उनका कहना था कि इसमें क्रीमीलेयर नहीं होना चाहिए। रौशन झा ने पूछा कि संविधान निर्माता के रूप में डा.बीआर आंबेडकर की ही नाम आता है। प्रो. विवेक ने बताया कि संविधान सभा में सात सदस्य थे, लेकिन उनमें से छह कई कारणों से इसमें शामिल नहीं हुए। तब बाबा साहब ने उन छह का भी काम अकेले किया। उन्होंने 7,365 संशोधन को पढ़ा और उनमें से 5,162 को खारिज कर दिया। इसके बाद 395 अनुच्छेद वाला संविधान अस्तित्व में आया। यह आम जन पर छोड़ते हैं कि उनके योगदान को किस रूप में देखते हैं। डा. नीलिमा और नीता सहाय ने पूछा कि आखिर यह आरक्षण कब तक चलेगा, क्या सामान्य वर्ग के बच्चों की पीड़ा आपको नहीं दिखती। जिन्हें आरक्षण मिल गया वह तो हमारी बराबरी में आ ही गए। फिर उन्हें क्यों लाभ मिलता है। वैसे भी यह तो केवल 10 वर्षों के लिए ही था। डा. राजकुमार फलवारिया ने इसपर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जिस 10 वर्षों की बात की जाती है, वह राजनीतिक आरक्षण के लिए था। सामाजिक वाले में कोई सीमा तय नहीं है। प्रो.विवेक कुमार ने दोहराया कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। भले कोई आरक्षण लेकर नौकरी पा जाता है, आर्थिक रूप से संपन्न हो जाता है, लेकिन उसमें सांस्कृतिक तौर पर बदलाव आ पाता है क्या। एक सार्थक संवाद में आरक्षण पर खुलकर चर्चा हुई और श्रोताओं को वक्ताओं ने अपने जवाब से संतुष्ट करने का प्रयास किया।