भोपालः लोकगीतों के बिना लोक नृत्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती. उसमें भी भगवान श्री कृष्ण के रास का कहना ही क्या? स्थानीय जनजातीय संग्रहालय सभागार में अहमदाबाद ध्वनि सेवक बसावड़ा ने अपने साथी कलाकारों के साथ 'गुजरात के लोकनृत्य' प्रस्तुत किया. इस नृत्य कार्यक्रम का शुभारम्भ कलाकारों ने 'मणियारो रास नृत्य' प्रस्तुत कर किया. इस नृत्य की विशेषता यह है कि इसे आधे ताल पर किया जाता है. मणियारो नृत्य को शुभ और मांगलिक अवसरों पर पुरुषों द्वारा किया जाता है. इसके बाद कलाकारों ने 'ढाल-तलवार नृत्य' प्रस्तुत किया. यह शौर्य रस का नृत्य है. इस नृत्य में युद्ध कौशल और युद्ध में जीत की ख़ुशी निहित होती है. इस नृत्य को प्रायः पुरुषों द्वारा ही किया जाता है. इसके बाद ध्वनि सेवक कलाकारों ने 'मिश्र रास' प्रस्तुत किया. इस नृत्य में राधा और कृष्ण को ही बिम्बित किया जाता है. इस नृत्य को पुरुष और महिला दोनों साथ में प्रस्तुत करते हैं.


गुजरात की सांस्कृतिक टीम हो और गरबा न हो, यह संभव है क्या? मिश्र रास के बाद 'गरबा मण्डवाड़ी नृत्य' की प्रस्तुति हुई. इस नृत्य को शुभ अवसरों और मांगलिक कार्यों के दौरान महिलाओं द्वारा किया जाता है. इसके बाद ध्वनि सेवक बसावड़ा ने अपने साथी कलाकारों के साथ प्राचीन 'गरबा नृत्य' प्रस्तुत करते हुए अपनी नृत्य प्रस्तुति को विराम दिया. प्राचीन गरबा नृत्य नवरात्री त्योहार पर विशेष तौर पर किया जाता है. इस नृत्य को महिलाओं द्वारा किया जाता है. नृत्य प्रस्तुति के दौरान मंच पर ध्वनि सेवक बसावड़ा, दृष्टि मजूमदार, नीता बाल, निरीक्षा वैद्य, दिग्विजय सिंह राठौड़, रमेश, निकुंज, प्रतीक, मयूर, धवल, जयराम और नितिन आदि ने अपने अभिनय कौशल से सभागार में मौजूद दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. नृत्य प्रस्तुति के दौरान ढोल पर हरदेव बारड़ और दीपसिंह हेरमा, शहनाई पर लथाबाई मीर और मजीरे पर बड़वंत मखौना ने सहयोग किया. निर्देशन ध्वनि सेवक बसावड़ा ने किया. ध्वनि सेवक बसावड़ा को कई प्रतिष्ठित सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.