लेखक व्याकरण के नियम व व्याकरण तोड़ता चलता है-अखिलेश

2018-12-06T07:29:21+00:00

गया: कथाकार व  साहित्यिक पत्रिका 'तद्भव ' के  संपादक अखिलेश की कहानियों पर केंद्रित आयोजन 'रेनेसाँस कल्चरल सेंटर में आयोजित किया गया। इस आयोजन में  गया के अलावा, पटना लखनऊ आदि  शहरों  के  साहित्यकार  व आलोचक शामिल हुए।  चर्चित कथाकार  'हंस' के संपादक संजय सहाय ने अतिथियों का स्वागत किया।

विषय प्रवेश करते हुए कवि सत्येंद्र कुमार   ने कहा " अखिलेश को सबसे अधिक पढ़ा गया।  गद्य को सीखने तथा अपने समय व समाज  को समझने के लिए कहानियां बेहद आवश्यक है। 1985-86 के बाद का समाज कैसे बदल रहा था, उपभोक्ता  संस्कृति का किस तरह प्रसार  हो रहा था इसका दस्तावेज हैं अखिलेश की रचनाएं "

चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने   अखिलेश के उपन्यास  ' निर्वासन ' तथा  'चिट्ठी  कहानी का जिक्र करते हुए कहा " चिट्ठी में आने समय व समाज के साथ पीड़ा उभरती है। इस कहानी को भाषा के स्तर पर किया गया खेल देखना हो, अंतर्मन में प्रवेश करना हो तो इस कहानी को देखना चाहिए। भाषा के साथ आने समय की दुःस्वप्नों को खोलने का जो कौशल रचा है वो  अद्भुत है। इनके' निर्वासन ' उपन्यास में मध्यवर्ग है  जिसका स्वप्नभंग हो चुका है।

 अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बतलाते हुए अखिलेश ने कहा  "  यदि एक लेखक कहेगा कि बहुत बुरा समय है तो उसके ऐसे डालने की क्षमता में उर्वरा नहीं होती। एक लेखक में अर्थ की तासीर पैदा करने की क्षमता क्षीण हो जाती है। "

 अखिलेश ने कालिदास, मार्केख आदि का उदाहण देते हुए कहा " एक किस्सागो को कहने का दूसरा सलीका विकसित करना पड़ता है। जब मैं खुद लिखता हूँ तो ऐसा कभी नहीं होता कि किसी ख़ास  चरित्र की अनुकृति को। समाज से चरित्र लेता भी है तो उसे थोड़ा दूसरे तरीके से बनाना पड़ता है। एक प्रदत्त भाषा होती है दूसरा अर्जित भाषा। यदि कोई अभिव्यक्ति बाधा खड़ी करता है  अच्छा लेखक व्याकरण, नियम को भी तोड़ता है।  अभी आप खिलंदड़ी भाषा मे लिख रहे हैं दूसरी तरफ कारुणिक प्रसंग लिखना पड़ता है ये शिफ्टिंग जैसे हो ये एक चुनौती रहती है।"

आलोचक वीरेंद्र यादव ने अखिलेश की कहानियों पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा " यदि किसी कलाकृति से समय व समाज की शिनाख्त कर सकें तभी उसकी सार्थकता होती है। अखिलेश कहानीकार, उपन्यासकार संपादक भी हैं।चिट्ठी ' कहानी में में इलाहाबाद विश्विद्यालय का चुनाव कैसे जनेऊ दिखाकर जीता गया उसकी बानगी है। आज जातिवाद की चर्चा हो रही है लेकिन तब ये सब बातें हो रही थी। अखिलेश की कहानियों में औपन्यासिक दृष्टि नज़र आती है।  बेरोजगारी की' त्रासदी 'और 'बायोडाटा' में दुआरे रूप में आता है।"

संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर ने  अखिलेश की कहानियों पर विचार प्रकट करते हुए कहाइनकी कहानियों में स्त्री पुरुष के बदलते संबंधो तथा संपत्ति के  सम्बन्ध को  उठाया गया है। अखिलेश की कहानियां में पाठक को आगे क्या की उत्सुकता अंत मे पाठकों को क्यों का जवाब दे देती है।"

सभा के  प्रमुख लोगों में अरुण हरलीवालयोगेश प्रताप शेखर, अनुज लुगुन, कृष्ण कैमर, अब्दुल कादिर, अशोक तिवारी आदि मौजूद थे।

कहानियों पर बातचीत के पश्चात प्रेमचन्द की खाने ' विनोद' का मन्चन संजय सहाय के निर्देशन में किया गया जिसे  बड़ी संख्या में दर्शकों ने देखा। 

About the Author:

Leave A Comment