मजलूमों की जबान थे अली सरदार जाफरी

2018-12-05T18:57:31+00:00

अली सरदार जाफरी एक ऐसे नगमानिगार थे, जिन्हें सिर्फ एक शायर कहना नाइन्साफ़ी होगी, वह एक अच्छे आलोचक, फ़िल्मसाज़, प्रभावशाली वक़्ता, आंदोलनकारी, चिर विद्रोही और देशभक्त थे. उन्होंने कई विधाओं और स्टाइल में लिखा. अली सरदार जाफरी का जन्म 1 नवम्बर, 1913 को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में हुआ था. वह एक प्रगतिशील लेखक आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे.उन्होंने दिल्ली के अंग्लो-अरेबिक कॉलेज से ग्रेजुएशन किया पर कर्मभूमि बनाया मुंबई को. उन्होंने फिल्मो के लिए भी गीत लिखे और शेरो शायरी की कई किताबें भी. अली सरदार जाफरी ने अपनी शायरी में फ़ारसी का अधिक प्रयोग किया है, फिर भी उनकी रचनाएं आम आदमी तक पहुंची और बेहद मशहूर हुईं. उनकी क़लम का लोहा देश में ही नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय साहित्य जगत में भी माना जाता है. वह उर्दू अदब की दुनिया में काफी रोशन नाम हैं.
जाफरी ने बतौर लेखक कभी शायरी नहीं छोड़ी, तब भी नहीं जब इनका झुकाव वामपंथी राजनीति की ओर हुआ और वे कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गए. इस राजनैतिक उठा-पटक का नतीजा यह हुआ कि उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. पर उन्होंने कई रचनाएं जेल की सीखचों के भीतर रह कर ही लिखीं. उनकी प्रमुख कृतियों में परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘ख़ूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख़्वाब और' (1965), 'पैराहने शरर' (1966), 'लहु पुकारता है' (1978) और 'मेरा सफ़र' (1999) शामिल है. अपने लेखन के लिए उन्हें कई पुरस्कार और उपाधियाँ भी मिलीं, जिनमें पद्मश्री, ज्ञानपीठ, इक़बाल सम्मान, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, रूसी सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार और कुमारन आशान पुरस्कार आदि शामिल हैं.

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