कोई पहाड़ संगीन की नोक से बड़ा नहीं, और कवि धूमिल की याद

2018-11-09T10:57:46+00:00

हिंदी कविता के एंग्री यंगमैन सुदामा पांडे 'धूमिल' का जन्म 9 नवंबर को हुआ था. वह विद्रोही कवि थे, गांव और देश उनकी आत्मा में बसता था. उनके विद्रोह के निशाने पर केवल सियासत, व्यवस्था, संसद ही नहीं बल्कि साहित्य और साहित्यकार भी थे. विधिवत अध्ययन की कमी को उन्होंने जीवन भर झेला. स्त्रियों को लेकर उनकी सोच मर्दवादी थी और गांवों व शहरों के बीच पक्षधरता को लेकर वह इतने कट्टर थे कि जब प्रख्यात कवि अशोक वाजपेयी का संग्रह 'शहर अब भी संभावना है' आया तो उन्होंने यह कहकर उसकी आलोचना की कि शहर तो एक फ्रंट है, वह संभावना कैसे हो सकता है?
बावजूद इसके वह सच्चे अर्थों में किसान जीवन के दुःखों व संघर्षों के प्रवक्ता थे. उन्होंने सामंती संस्कारों से लड़ने वाले लोकतंत्र के एक योद्धा कवि के रूप में अपने को इस कदर स्थापित किया कि बाद के सभी विद्रोही कवियों ने किसी न किसी रूप में उनसे प्रेरणा ली. जागरण हिंदी धूमिल के जन्मदिन पर अपने पाठकों के लिए उनकी कुछ कविताएं यहां प्रस्तुत कर रहाः
अंतर

कोई पहाड़
संगीन की नोक से बड़ा नहीं है
और कोई आँख
छोटी नहीं है समुद्र से
यह केवल हमारी प्रतीक्षाओं का अंतर है –
जो कभी
हमें लोहे या कभी लहरों से जोड़ता है

गृहस्थी : चार आयाम

1
मेरे सामने
तुम सूर्य – नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं – स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)

2
मेरी भुजाओं में कसी हुई
तुम मृत्यु कामना कर रही हो
और मैं हूँ-
कि इस रात के अंधेरे में
देखना चाहता हूँ – धूप का
एक टुकड़ा तुम्हारे चेहरे पर

3
रात की प्रतीक्षा में
हमने सारा दिन गुजार दिया है
और अब जब कि रात
आ चुकी है
हम इस गहरे सन्नाटे में
बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर
किसी स्वस्थ क्षण की
प्रतीक्षा कर रहे हैं

4
न मैंने
न तुमने
ये सभी बच्चे
हमारी मुलाकातों ने जने हैं
हम दोनों तो केवल
इन अबोध जन्मों के
माध्यम बने हैं

रोटी और संसद

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

लोहे का स्वाद
(अंतिम कविता)

"शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग"

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है.

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