हिंदी साहित्य, दीया और दीपोत्सव – दोनों ओर प्रेम फलता

2018-11-06T10:49:32+00:00

दीपावली उत्तर भारत का सबसे बड़ा त्योहार तो है ही दुनिया के कई देशों में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है. इसीलिए भारतीय, खासकर हिंदी साहित्य में तो इसका उल्लेख है ही संस्कृत साहित्य पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी इसका जिक्र मिलता है. हर्ष के नाटक नागानंद में भी इस उत्सव की चर्चा मिलती है. वह इसे दीपप्रतिपादुत्सव: कहते हैं, तो राजशेखर काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका कहते हैं. यह त्योहार केवल हिंदुओं का ही नहीं है बल्कि इसे सिख, बौद्ध और जैन धर्म को मानने वाले भी मनाते हैं. प्रवासी भारतीयों में तो यह प्रचलित है. इस मायने में दीवाली देश का सबसे सुन्दर त्यौहार है. यह खरीफ की फसल कटने के बाद आती है. आइए देखते हैं, हिंदी साहित्य में दीपोत्सव का उल्लेख बहुत व्यापक है, पर यहां हम केवल कुछ चुनिंदा कवियों की रचनाओं का जिक्र करेंगे कि उन्होंने दीप और दीपोत्सव की महिमा का कब-कब, कैसे बखान किया है.

 

कबीरा निर्भय राम जप, जब लग दिय में बाती,
तेल घटा बाती बुझी, सोवेगा दिन राती.
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जब मै था तब हरी नहीं ,अब हरी है मै नाही,
सब अँधियारा मिट गया ,जब दीपक देखा माही. – संत कबीर दास
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पेड़ पर रात की अंधेरी में
जुगनुओं ने पड़ाव हैं डाले
या दिवाली मना चुड़ैलों ने
आज हैं सैकड़ों दिये बाले। – कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध
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रंग गयी पग-पग धरा,
हुई जग जगमग मनोहरा. – कवि सुमित्रानंदन पंत
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मैं मंदिर का दीप-सदा नीरव जलाता हूँ।   – महादेवी वर्मा
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मेरे छोटे घर कुटीर का दिया
तुम्हारे मन्दिर के विस्तृत आंगन में
सहमा-सा रख दिया गया- 
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दीपक हूं, मस्तक पर मेरे
अग्निशिखा है नाच रही
यही सोचा-समझा था शायद
आदर मेरा करें भी।
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यह दीप अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।   – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
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एक बरस में एक बार ही जगती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाजी जलती दीपों की माला
दुनियावाले, किन्तु किसी दिन आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दिवाली रोज मनाती मधुशाला – डॉ हरिवंश रॉय बच्चन
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दीप जले द्वार द्वार, झिलमिल जलते- गिरिजाकुमार माथुर 
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तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊँगा! –  गोपालदास 'नीरज'

और आखिर में मैथिली शरण गुप्त की 'दोनों ओर प्रेम पलता है' कविता के साथ दीपक महात्म्य को समझें

दोनों ओर प्रेम पलता है
सखि पतंग भी जलता है हा दीपक भी जलता है

सीस हिलाकर दीपक कहता
बंधु वृथा ही तू क्यों दहता
पर पतंग पड़कर ही रहता कितनी विह्वलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है

बचकर हाय पतंग मरे क्या
प्रणय छोड़कर प्राण धरे क्या
जले नही तो मरा करें क्या क्या यह असफलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है

कहता है पतंग मन मारे
तुम महान मैं लघु पर प्यारे
क्या न मरण भी हाथ हमारे शरण किसे छलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है

दीपक के जलने में आली
फिर भी है जीवन की लाली
किन्तु पतंग भाग्य लिपि काली किसका वश चलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है

जगती वणिग्वृत्ति है रखती
उसे चाहती जिससे चखती
काम नही परिणाम निरखती मुझको ही खलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है

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