लेखक पुरस्कार के लिए नहीं लिखता, पर पाने की खुशी तो होती ही हैः ममता कालिया

2018-10-08T14:58:20+00:00

नई दिल्ली: "कोई भी लेखक पुरस्कार के लिए नहीं लिखता, न ही लेखन पर लेखक का कोई अधिकार होता है. एक किसान की तरह वह शब्दों की फसल बोता है और जैसे किसान को फसल के कटकर आ जाने तक भी पता नहीं होता कि यह कहां, किस बाजार में, कितने का बिकेगा, वही हाल लेखक का है. उसकी रचना पर प्रकाशक और फिर पाठक का आधिपत्य अधिक होता है. ऐसे में पुरस्कारों की कौन सोच सकता है?" एक लेखक के लेखन पर पुरस्कारों का कितना असर होता है? पर चर्चित लेखिका ममता कालिया की यह त्वरित टिप्पणी थी. आगामी 17 अक्तूबर को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के मल्टीपरपज हाल में ममता कालिया को वर्ष 2017 के प्रतिष्ठित व्यास सम्मान से नवाजा जाएगा. उन्हें यह सम्मान लेखिका और गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा के हाथों प्रदान किया जाएगा. दिसंबर 2017 में के. के. बिरला फाउंडेशन ने ममता कालिया को इस पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की थी. तब साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी की अगुआई में फाउंडेशन की चयन समिति ने ममता कालिया को उनके उपन्यास 'दुक्खम – सुक्खम' के लिए सत्ताइसवें व्यास सम्मान से नवाजने का निर्णय लिया था. उनका यह उपन्यास साल 2009 में प्रकाशित हुआ था. इस पुरस्कार के तहत ममता कालिया को सम्मान के रुप में साढ़े तीन लाख रुपए की राशि दी जाएगी. याद रहे कि व्यास सम्मान की शुरुआत साल 1991 में की गई थी. यह सम्मान किसी भारतीय नागरिक की दस वर्ष की अवधि में हिंदी में प्रकाशित रचना को दिया जाता है. पहला व्यास सम्मान डॉ रामविलास शर्मा को दिया गया था. 

ममता कालिया हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं. वह लगभग 6 दशक से लेखन में सक्रिय हैं. उनका जन्म 2 नवंबर, 1940 को वृन्दावन में हुआ था. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की और मुंबई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में परास्नातक विभाग में व्याख्याता रहीं. साल 1973 में इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज में प्राचार्य नियुक्त हुईं और वहीं से 2001 में अवकाश ग्रहण किया. उन्हें हिंदी व अंग्रेजी, दोनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार हासिल है. वह दोनों भाषाओं में सृजनरत रहीं. उन्होंने बेघर, नरक-दर-नरक, दुक्खम-सुक्खम, सपनों की होम डिलिवरी, कल्चर वल्चर, जांच अभी जारी है, निर्मोही, बोलने वाली औरत, भविष्य का स्त्री विमर्श समेत कई रचनाओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया. उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा यशपाल कथा सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान एवं राम मनोहर लोहिया सम्मान तथा वनमाली सम्मान व वाग्देवी सम्मान से भी नवाजा जा चुका है. व्यास सम्मान पर ममता कालिया कहती हैं कि  एक ऐसे संस्थान से जहां आप किसी को भी न जानते हों, और आपने अपनी रचना तक उन्हें सम्मान के लिए न भेजी हो, से सम्मानित होना, कहीं न कहीं आपको उस संस्थान की निष्पक्ष कार्यप्रणाली के साथ ही आपके लेखक को भी संतोष से भरता है. 'दुक्खम – सुक्खम' को रविंद्र कालिया जी ने दबाव डालकर लिखवाया था, वरना मैं सोचती थी कि इतनी पुरानी दादी की कहानी कौन पढ़ेगा. पर अब जब उसे इतनी सराहना और व्यास सम्मान मिल रहा तो खुशी तो होती ही है.

 

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