भारतेंदु जयन्ती पर बिहार के नाट्य साहित्य पर परिचर्चा

2018-09-10T11:41:39+00:00

 पटना, 10 सितंबर  "महाकवि तुलसी के बाद साहित्य के माध्यम से लोकजागरण  का काम भारतेंदु हरिश्चंद ने किया। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को माध्यम बनाकर  इसका नया रूप गढ़कर आधुनिक हिंदी के लिए महान कार्य किया।  भाषा को जन- जन को जोड़ने वाली  सम्पूर्ण समाज व देश को संयुक्त करने वाली सेतु होती है।  भारतेन्दु के नाटक झकझोरते और आंदोलित करते हैं। बिहार के नाटककारों का नाट्य साहित्य में काफी योगदान है।"

ये बातें  बिहार हिंदी  साहित्य सम्मेलन द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र जयन्ती के अवसर पर "नाट्य साहित्य में बिहार का योगदान" पर बोलते हुए बिहार विश्विद्यालय सेवा आयोग के  पूर्व अध्यक्ष  प्रो शशिशेखर तिवारी ने कहा। पिछले दिनों सम्मेलन में  कविता, कहानी के पश्चात नाटको के क्षेत्र में बिहार के योगदान पर चर्चा  हुई।

विषय को आगे बढाते हुये  चर्चित नाट्य समीक्षक अशोक प्रियदर्शी ने कहा " बिहार में नाट्य साहित्य का आरंभ 1880 से केशव राम भट्ट के 'शमशाद  सौसन' नाम से लिखे गए नाटक से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसका प्रकाशन ' बिहार बंधुप्रेस से हुआ था। भट्ट जी ने  1876 में  'पटना नाटक मंडली ' बनाई थी जिससे नाटकों का मंचन किया जाता था।  आरम्भ में यहां के नाटकों पर पारसी रंगमंच का प्रभाव था लेकिन बाद में इसका स्वतंत्र रूप सामने आया।" अशोक प्रियदर्शी ने रामवृक्ष बेनीपुरी, राधिका रमण प्रसाद सिंहअनिल कुमार मुखर्जी, चतुर्भुज, स्टेश प्रसाद सिन्हा, रामेश्वर सिंह कश्यप उर्फ लोहा सिंह  जैसी विभूतियों के  अवदानों की चर्चा करते हुए कहा " बिहार का नाट्य साहित्य इनके अवदानों से उपकृत है। बिहार में नाट्य साहित्य को गति प्रदान की डॉ चतुर्भुज ने नाट्य मंचन के लिए ' मगध कलाकार 'की स्थापना की जो आज भी सक्रिय है। डॉ चतुर्भुज गांव-गांव जाकर नाटक किया करते थे। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पिता वैद्य जी भी उन नाटकों में भाग लिया करते थे।"

ज्ञातव्य हो अशोक प्रियदर्शी बिहार के चर्चित नाटककार चतुर्भुज के सुपुत्र भी हैं और अपने बचपन से ही नाटकों से इनका जुड़ाव रहा है।

 इस मौके पर कवयित्री सरिता  गुप्ता के काव्य संग्रह "जाग रे मन' का लोकार्पण हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अनिल सुलभ द्वारा किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा " भारतेंदु ने खड़ी बोली हिंदी को उंगली पकड़कर चलना सिखाया। सत्य हरिश्चंद्र अंधेर नगरी आज सौ वर्षों के बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है।"

इस मौके पर सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, दा शंकर प्रसाद, दा मधु वर्मा,जहानाबाद के जिलाधिकारी आलोक रंजन घोष ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

कार्यक्रम का संचालन योगेंद्र प्रसाद मिश्र ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन नागेश्वर प्रासाद यादव में किया। संगोष्ठी में पटना के साहित्यिक जगत के  लोग खासी  संख्या में उपस्थित थे। प्रमुख लोगों में डॉ  विनय कुमार विष्णुपूरीआचार्य आनंद किशोर शास्त्री, शालिनी पांडे, जयप्रकाश पुजारी, बांके बिहारी साव, पंकज प्रियम, आराधना प्रसाद, बच्चा ठाकुर, पूनम सिन्हा, नरेंद्र कुमार सिन्हा आदि मौजूद थे।

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