भारत कला भवन में लगी कवि लीलाधर मंडलोई के छायाचित्रों की प्रदर्शनी

2018-09-08T11:44:15+00:00

वाराणसीः हाल के दिनों में हमारे समय के चर्चित कवि-संपादक लीलाधर मंडलोई ने छायाचित्रों के जरिये मुक्तिबोध के बिम्बों को तलाशने की उल्लेखनीय कोशिश की है. अपने आसपास की चिर-परिचित वस्तुओं के अपेक्षाकृत क्लोज अप के छायांकन से उन्होंने मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना को दृश्य-जगत में रेखांकित किया है. पेड़ों के तनों, उनकी टहनियों, छालों और कोटरों, टूटी टोकरियों, उनकी खपचियों, फटे हुए टाट के रेशों, पत्थरों और ऐसी ही अनेक वस्तुओं की बनक में छिपे बिम्बों को उन्होंने कैमरे की आँख से तलाशते-टटोलते हुए उन्हें मुक्तिबोध के काव्य-बिम्बों से जोडऩे का काम किया है. इन छायांकनों में वस्तुओं के अनूठे उभारों और गहराईयों को उनके खुरदुरे या चिकनेपन की विशिष्टता के साथ छाया-प्रकाश के किस क्षण में किस कोण से पकडऩा है कि निहायत जड़ और अन्यथा अर्थहीन महसूस होने वाली उनकी उपस्थिति एकाएक सारवान हो उठे, इस चयन में कलाकार की आंतरिक दृष्टि और कल्पनाशीलता महत्वपूर्ण होती है. अपनी कविताओं के लिये पहचाने जाने वाले मंडलोई इस नये माध्यम को बरतते हुए जिसे सुगढ़ता से साधते हैं. टेक्सचर के साथ-साथ रंगों की परत-दर-परत आभा और छींटों के आवेग को समेट लेते वक्त भी उनके भीतर का कलाकार सजग रहा है.

 

'एब्स्ट्रैक्ट फोटोग्राफी आर्ट एन एक्जीबिशन- देखा-अदेखा, जो आज से वाराणसी के भारत कला भवन में लगी है के पूर्वावलोकन पर लीलाधर मंडलोई' ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा था, "मुक्तिबोध के पहले कविता-संग्रह 'चांद का मुंह टेढ़ा है' की भूमिका में शमशेर बहादुर सिंह ने उनके काव्य पर विचार करते हुए लिखा है 'गजानन माधव मुक्तिबोध मुझे शायद इसलिए ज़्यादा अपील करता है कि वह मुझसे भिन्न है। ऐब्स्ट्रेक्ट नहीं, ठोस। बहती हवाओं सा लिरिकल, अर्थहीन-सा कोमल, न कुछ नहीं: बल्कि प्रत्येक पंक्ति में चित्र के उभार को और भी घूरती और भी ताड़ती हुई आंख से प्रत्यक्ष करता हुआ..' जाहिर ही चाक्षुष और प्रदर्शन कलाओं के लिये भी मुक्तिबोध की कविताएँ उत्प्रेरक का काम करती रही हैं. अपने आसपास के संसार को खुली आँखों से देखने और उसे रंगों-रुपों में व्यक्त करने के लिये उकसाती रही हैं।.जिस किसी ने उनकी कविताओं के विविध नाट्य-रुपांतरण या फिल्में देखी होंगी, वह उनमें निहित लयात्मकता और रंग वैविध्य की ताकत का गवाह होगा." जाहिर है मंडलोई ने इसका पूरा ध्यान रखा है. चित्र-संयोजन की अनिवार्य शर्त कला-तत्वों के संतुलन का निर्वाह है. अनुपात की ज़रा सी चूक से कृति के निष्प्रभावी हो जाने का खतरा बना रहता है. अपने अधिकतर छायांकनों में मंडलोई न केवल उस संतुलन को साधने बल्कि मुक्तिबोध के काव्य-बिम्बों से उनका जीवन्त रिश्ता बनाने में सफल रहे हैं. संघर्षपूर्ण अतीत ने मंडलोई को जीवन में व्याप्त विविध रूप, रंग, स्पर्श और गंध के साथ ही श्रम के प्रति संवेदनशील बनाया है. इसके अलावा अनगढ़ सौंदर्य को पहचानने की ताकत और मीडिया के अपने दीर्घ अनुभव से दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रयोग की दक्षता स्वाभाविक ही उनकी रचनाओं में मुखर होती रही है. मुक्तिबोध पर बनायी उनकी लघु-फिल्म भी चर्चा में रही है. छायांकनों के जरिये मुक्तिबोध के आत्म-संघर्ष को पकडऩे की उनकी कोशिश मगर, अपने तरह का अभिनव प्रयोग है. उनके ये प्रयोग नई संभावनाओं के साथ इस माध्यम में उनकी उपस्थिति दर्ज कराते हैं. बनारसवासियों के लिए यह मौका है, एक कवि के कवित्व को चित्र रूप में कैद कैनवास पर देखने का, तो पहुंचिए जरूर!

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