कथा साहित्य संघर्ष के दौर में खूब लिखा जाता है- राय

2018-09-08T20:47:42+00:00

पटना, 8 अगस्त।  बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वाधान में राजभाषा हिंदी पखवाड़ा चल रहा है। इस मौके पर साहित्य सम्मेलन में 'पुस्तक चौदस मेला-2018' का भी आयोजन किया गया है। प्रतिदिन इस दौरान विचारगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। पखवाड़ा के छठे दिन "हिंदी कथा साहित्य में बिहार के योगदानको लेकर विशद चर्चा की गई।

सभी वक्ताओं ने कहा कि हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध करने में बिहार के साहित्यकारों ने बड़ी भूमिका रही है। सदल मिश्र से लेकर देवकी नंदन खत्री, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, राहुल सांकृत्यायन , बाबा नागार्जुन, रामवृक्ष बेनीपुरी, फणीश्वर नाथ रेणु सहित कई साहित्यकारों ने बड़ी भूमिका निभाई है। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के इस आयोजन में मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ रामवचन राय ने कहा " संघर्ष के दौर में कथा साहित्य खूब लिखा जाता है। विगत डेढ़ सौ वर्षों में भारतीय समाज बड़े संघर्ष से  गुजरा  इसलिए कहानियां खूब लिखी गयी है। हिन्दी के मूर्द्धन्य साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय की पुस्तक ' मुंडमाल' सम्पूर्ण भारत वर्ष में चर्चित हुई। हिंदी के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद पर पहली आलोचनात्मक पुस्तक बिहार से प्रकाशित हुई। पंडित जनार्दन झा 'द्विजने 1923 में यह  अलोचनात्मक ग्रन्थ लिखा।रामवचन राय ने आगे कहा कि  " प्रकाशन की दृष्टि से भी बिहार  अग्रणी रहा। पटना के खड्ग विलास प्रेस  ने प्रेमचन्द के अनेक पुस्तकों का प्रकाशन किया। 

भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तकों का प्रकाशन भी यहां हुआ। हिंदी कथा साहित्य में 1950 से 1960 का काल नई कहानियों का काल माना जाता है। उसी काल में फणीश्वर नाथ रेणु अपनी ' मैला आँचल ' लेकर आये, जिसने कथा साहित्य में मील का पत्थर स्थापित किया।"

कवि , व्यंग्यकार व कथाकार भगवती प्रसाद  द्विवेदी  ने अपने संबोधन में कहा " सम्पूर्ण भारतवर्ष में बिहार के कथाकार हिंदी  साहित्य की रचनाधर्मिता को प्रभावित करते हैं।यहां की भूमि कथा लेखन के लिए बड़ा ही उर्वरा है।  अनेक प्रतिभाशाली कथाकारों को जन्म दिया।भोजपुर के कथाकार सदल मिश्र ने 'नासीकेतोपाख्यान ' नामक खड़ी बोली  हिंदी की पहली कहानी लिखी थी, जो 1860 के आसपास लिखी गई थी।"  

संगोष्ठी  में हिंदी साहित्य सम्मेलन के  अध्यक्ष अनिल सुलभ, उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, पटना विश्विद्यालय में हिंदी के अवकाशप्राप्त प्राध्यापक शंकर प्रसाद, राजकुमार प्रेमी, डॉ विनय कुमार विष्णुपुरी, आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, जयप्रकाश पुजारी, बांके बिहारी साव, पंकज प्रियम, कृष्ण मोहन प्रसाद, अनिल कुमार सिन्हा, ज्ञानेश्वर शर्मा, आनद किशोर मिश्र  और मधु वर्मा ने भी अपने विचार रखे।

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