भाषा के निर्णायक तत्वों को लेकर हुई बहस

2018-03-27T05:17:10+00:00

— बिजवासन में दैनिक जागरण मुक्तांगन कार्यक्रम का हुआ आयोजन

जागरण संवाददाता, पश्चिमी दिल्ली :
किसी भी रचना की भाषा में पात्र, स्थान या विषय में निर्णायक कौन सा तत्व होता है। पात्र की बोली महत्वपूर्ण है या वह परिवेश जिसमें वह पात्र बसता है या फिर वह विषय जिस पर रचना का पूरा ताना- बाना बुना जाता है। दैनिक जागरण मुक्तांगन में इस बार भाषा के इन्हीं निर्णायक तत्वों को लेकर बहस हुई। बहस में हिंदी जगत से जुड़ी प्रत्यक्षा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, नीलोत्पल मृणाल व आकांक्षा पारे काशिव ने हिस्सा लिया। दो सत्रों में बंटे इस आयोजन के प्रथम सत्र में जहां भाषा के निर्णायक तत्वों को लेकर बहस हुई वहीं दूसरे सत्र में तंदूर मर्डर : अपराध, समाज और तंत्र पर चर्चा हुई। चर्चा में द तंदूर मर्डर किताब के लेखक मैक्सवेल परेरा के साथ राहुल देव व राकेश वैद ने हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम हर महीने दैनिक जागरण की मुहिम ‘हिंदी हैं हम’ के तहत बिजवासन स्थित उषा फार्महाउस में आयोजित किया जाता है।

कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी जगत के दो हस्तियों को श्रद्धांजलि देने से हुई। कवि व व्यंगकार सुशील सिद्धार्थ के निधन पर विवेक मिश्रा के श्रद्धांजलि संदेश को कार्यक्रम की संयोजक अराधना प्रधान ने पढ़कर सुनाया। वहीं केदारनाथ सिंह के निधन पर लीलाधर मंडलोई ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में लोक व नागर जीवन दोनों की झलक देखने को मिलती है। प्रथम सत्र में भाषा को लेकर बहस की शुरुआत करते हुए नीलोत्पल ने कहा कि पात्र की भाषा ही रचना की भाषा होनी चाहिए। एक लेखक को पात्र की भाषा के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। भाषा के स्तर पर पात्र के साथ किसी भी किस्म की जबरदस्ती ज्यादती होगी। लेखक को हमेशा पात्र के मनोविज्ञान को समझना चाहिए ताकि उसकी भाषा को वह अपनी कलम से स्वाभाविक बोली दे सके। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि भाषा में स्थानीयता का पुट होना जरुरी है। परिवेश का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। परिवेश व भाषा में तालमेल जरुरी है। बहस को आगे ले जाते हुए प्रत्यक्षा ने कहा कि जब हम किसी पात्र के लिए उसके आसपास का परिवेश रचते हैं तब हम अपने खुद के भीतर भी झांकने लगते हैं। पात्र और हमारे बीच की दूरी मिटने लगती है। लेकिन एक रचनाकार के लिए पात्र का चयन करना बहुत बड़ा कार्य है। भाषा पर पात्र व उसके परिवेश का गहरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन इस बात का भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि भाषा ऐसी हो जो अपने समय के साथ तालमेल बिठाए रखे।

भाषा में आत्मसात करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। बहस की समाप्ति पर आकांक्षा ने कहा कि भाषा को यांत्रिक नहीं होना चाहिए। दूसरे सत्र की शुरुआत राहुल देव ने तंदूर हत्याकांड के बारे में संक्षिप्त जानकारी देकर की। द तंदूर मर्डर के लेखक मैक्सवेल परेरा से उन्होंने पूछा कि दो दशक पुराने हत्याकांड पर किताब इतने दिनों बाद क्यों लिखी गई। मैक्सवेल ने इसका उत्तर देते हुए कहा कि वर्ष 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर अंतिम फैसला आया तब लिखना शुरु किया। इसके पहले कभी कोर्ट की सुनवाई तो कभी अन्य कारणों से पुस्तक लिखने का मौका नहीं मिला। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसे हत्याकांड पर लिखी गई कहानी है जिसे अंजाम देने वाला अपने समय की जानी- मानी हस्ती था। राजनीति में उसकी दखल थी। उसके पास पैसा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह बहुत शातिर था। पुलिस के लिए इस मामले में छानबीन करना एक कठिन काम था। पुलिस को मामले से भटकाने के लिए कई बार प्रलोभन दिए जाते थे। मृतक के परिजन सहयोग देने से साफ साफ इंकार करते थे। बावजूद पुलिस ने अपना काम पूरी तन्मयता के साथ किया। राकेश वैद ने भी मैक्सवेल से उनकी पुस्तक के संदर्भ में कई सवाल किए।

समाप्त
गौतम कुमार मिश्रा
25 मार्च 18

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