श्री शक्ति सिन्हा के साथ साक्षात्कार 2017-12-15T13:24:50+00:00

श्री शक्ति सिन्हा

श्री शक्ति सिन्हा नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी के निदेशक हैं. इसके अलावा वह इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज श्रीलंका के Distinguished Fellow हैं. श्री शक्ति सिन्हा 1979 बैच के आई ए एस अफसर रहे हैं, जिन्होंने संयुक्त सचिव से लेकर मुख्य सचिव तक की प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है. 2006-09 तक उन्होंने अफगानिस्तान में यूएन की गवर्नेंस और डेवलपमेंट टीम की अगुवाई की है. इसके अलावा वो वर्ल्डबैंक में सलाहकार भी रह चुके हैं. श्री शक्ति सिन्हा सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज में रिसर्च फेलो रह चुके हैं. उनकी अबतक तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं और कई लेख अंतराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं. उन्हें स्ट्रैटजिक अफेयर्स का विशेषज्ञ भी माना जाता है और वह कई थिंक टैंक की अगुवाई भी कर चुके हैं।

श्री शक्ति सिन्हा के साथ साक्षात्कार

दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति की चयन समिति के सदस्य श्री शक्ति सिन्हा देश के सबसे बड़े शोध संस्थानों में से एक नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी के निदेशक हैं। दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति की पहल को वो हिंदी में शोध की दिशा में एक सकारात्मक पहल मानते हैं। दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति को लेकर उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश

हिंदी में मौलिक शोध की कमी की वजह आप क्या मानते हैं?

शक्ति सिन्हा- मेरा मानना है कि 1947 में देश के आजाद होने के बाद हम भाषाई तौर पर आजाद नहीं हो सके। अंग्रेजी को लेकर पूरे देश में जिस तरह का वातावरण बनाया गया कि उसके बगैर काम नहीं चल सकता। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया ताकि अंग्रेजी का वर्चस्व कायम रह सके। हिंदी में मौलिक शोध की कमी की कई वजहें हैं, लेकिन हिंदी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के तौर पर स्थापित नहीं करने से हिंदी में मौलिक शोध को बढ़ावा नहीं दिया जा सका।

हिंदी में मौलिक शोध को बढ़ावा नहीं दिए जाने का क्या नुकसान देखते हैं आप?

शक्ति सिन्हा – मेरा मानना है कि अकादमिक क्षेत्र में इससे बहुत नुकसान हुआ। हमारे विद्वतजन या शोधार्थी लगातार विदेशी अवधारणाओं के इर्द गिर्द ही काम करते रहे। भारतीय स्थितियों या भारतीय पद्धितियों का विदेशी अकादमिक औजारों से विश्लेषण होता रहा । नतीजा यह हुआ कि हमारा अकादमिक गतिविधियां या निष्कर्ष जमीनी हकीकतों से दूर होते चले गए। कई बार उनको अंतराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली लेकिन शोध का जो एक उद्देश्य होता है कि वो समाज की बेहतरी के लिए छोटा सा योगदान करे, उसमें पिछड़ते चले गए।

दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति को लेकर आपकी क्या अपेक्षाएं हैं और जो शोधार्थी आवेदन करना चाहते हैं उनको क्या कहना चाहते हैं।

उत्तर- दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति एक सार्थक और सकारात्मक पहल है। कोशिश ये होनी चाहिए कि जो भी शोध किए जाएं उसमें स्थानीय संदर्भों का इस्तेमाल हो, भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रमुखता से सामने रखकर शोध की दिशा तय हो। अब तक अनुवाद पर हमारी निर्भरता ज्यादा रहेगी तबतक भारतीय ज्ञान पद्धति को मजबूती नहीं मिलेगी। जब हिंदी में मौलिक शोध को बढ़ावा मिलेगा तो आयातित अनूदित ज्ञान पर हमारी निर्भरता कम होगी। जब स्थानीय स्तर पर बेहतर शोध सामग्री उपलब्ध होगी तो हम मजबूती के साथ भारतीय अवधारणाओं को वैश्विक पटल पर सामने रख पाएंगें।

डॉ. एस. एन. चौधरी
डॉ. एस. एन. चौधरीसमाजशास्त्र में प्रोफेसर
दैनिक जागरण संपादक मंडल
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दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति